भारतकोश
सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

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सुदामा-चरित / ४१ विप्रन को प्रन है जु यही सुख संपति सों कछु काज नहीं। कै पढ़िबो, कै तपोधन है, कन माँगत बाँभनै लाज नहीं ॥१२॥ स्त्री कोदो सवाँ जुरतो भरि पेट, न चाहति हौं दधि दूध मिठौती ॥ सीत बितीत गयौ सिसियातहिं, हौं हठती पै तुम्हें न हठौती । जौ जनती न हितू हरि सों तुम्हें काहे का द्वारिका पेलि पठौती । या घर तें न गयो कबहुँ पिय ! टूटौ तवा अरु फूटी कठौती ॥१३॥ सुदामा छाँड़ि सबै जक तोहि लगी बक, आठहुँ जाम यहै जक ठानी । जातहिं दैहैं लदाय लड़ा भरि लैहौं लदाय यहै जिय जानी ॥ पावैं कहाँ तें अटारी अटा, जिनके विधि दीन्हीं है टूटी-सी छानी । जो पै दरिद्र लिखो है ललाट तौ, काहू-पै मेटि न जात अजानी ॥१४॥ स्त्री पूरन पैज करी प्रह्लाद की, खंभ सों बाँध्यो पिता जिहि बेरे । द्रौपदी ध्यान धर्यौ जबहीं, तबहीं पट-कोट लगे लगे चहुँ फेरे । ग्राह तें छूटि गयंद गयौ पिय ! है हरि को निहचै जिय मेरे । ऐसे दरिद्र हजार हरैं वै, कृपानिधि लोचन-कोर के हेरे ॥१५॥ सुदामा चक्कवै चौंकि रहे चकि-से, तहाँ भूले-से भूप कितेक गनाऊँ । देव गंधर्व और किन्नर जच्छ-से, साँझ लौं देखे खरे जिहि ठाऊँ ॥ तैं दरबार बिलोक्यौ नहीं अब तोहि कहा कहिकै समुझाऊँ । रोकिए लोकन के मुखिया, तहँ हौं दुखिया किमि पैठन पाऊँ ॥१६॥ स्त्री भूले से भूप अनेक खरे रहौ ठाढ़े रहौ तिमि चक्कवै भारी । देव गंधर्व और किन्नर जच्छ-से रोके जे लोकन के अधिकारी ॥

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