भारतकोश
सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

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सुदामा-चरित / ४३ सुख दुख करि दिन काटे ही बनैंगे, भूलि बिपति परे पै द्वार मित्र के न जाइए ॥२०॥ स्त्री विप्र के भगत हरि जगत-बिदित-बंधु, लेते सब ही की सुधि ऐसे महादानि हैं। पढ़े एक चटसार कही तुम कैयों बार, लोचन अपार वै तुम्हें न पहिचानिहैं ? एक दीनबन्धु, कृपासिन्धु फेरि गुरुबन्धु, तुम-सम कौन दीन जाकौ जिय जानिहैं ? नाम लेत चौगुनी, गए तें द्वार सौगुनी सो, देखत सहस्र गुनी प्रीति प्रभु मानिहैं ॥२१॥ (सवैया) सुदामा प्रीति मैं चूक न है उनके, हरि मों मिलिहैं उठि कंठ लगायकै । द्वार गये कछु दैहैं पै दैहैं वे, द्वारिकानाथजू हैं सब लायकै ॥ या विधि बीति गई पन द्वै, अब तौ पहुँचौ बिरधापन आयकै । जीवन केतौ है जाके लिए, हरि सों अब होहुँ कनावड़ौ जायकै ॥२२॥ स्त्री हूजे कनावड़ौ बार हजार-लौं, जौ हितू दीनदयाल-सों पाइए । तीनहुँ लोक के ठाकुर है, तिनके दरबार न जात लजाइए ॥ मेरी कही जिय में धरिके पिय, भूलि न और प्रसंग चलाइए । और के द्वार सा द्वार कहा पिय ! द्वारिकानाथ के द्वार सिधाइए ॥२३॥