भारतकोश
सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

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४४ / सुदामा-चरित (सवैया) सुदामा द्वारिका जाहु जू द्वारिका जाहु जू, आठहु जाम यहै जक तेरे । जौ न कहौ करिए तो बड़ो दुख, जैए कहाँ अपनी गति हेरे ॥ द्वार खरे प्रभु के छरिया तहँ भूपति जान न पावत नेरे । पांच सुपारी, तैं देख विचारिकै भेंट को चारि न चाउर मेरे ॥२४॥ (दोहा) यह सुनिकै तब ब्राह्मनी, गई परोसिनि-पास । पाव-सेर चाउर लिए, आई सहित-हुलास ॥२५॥ सिद्धि करी गनपति सुमिरि, वाँधि दुपटिया-खूँट । मांगत खात चलै तहाँ, मारग बाली-बूट ॥२६॥ तीन दिवस चलि विप्र के, दूखि उठे जब पाँय । एक ठौर सोए कहूँ, घास-प्यार बिछाय ॥२७॥ अंतरजामी आपु हरि, जानि भगत की पीर । सोवत लै ठाढ़ो कियो, नदी गोमती-तीर ॥२८॥ प्रात गोमती-दरस तें, अति प्रसन्न भो चित्त । बिप्र तहाँ असनान करि, कीन्हों नित्त-निमित्त ॥२९॥ भाल तिलक घसिकै दियौ, गही सुमिरिनी हाथ । देखि दिव्य द्वारावती, भयौ अनाथ सनाथ ॥३०॥ (कवित्त) दीठि चकचौंधि गई देखत सुबर्नमई, एक तें सरस एक द्वारिका के भौन हैं। पूछे बिन कोऊ कहूँ काहू सों न करै बात, देवता-से बैठे सब साधि-साधि मौन हैं ॥ देखत सुदामैं धाय पौरजन गहे पाय, “कृपा करि कहौ बिप्र कहाँ कीन्ह गौन हैं ?”