सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुदामा-चरित / ६३
ज्ञान नहीं है कि जिनके भाग्य में टूटी-फूटी झोपड़ी लिखी हो, उन्हें ऊँचे भव्य भवन नहीं मिल सकते हैं। फलतः उसकी भोली पत्नी को यह समझ लेना चाहिए कि यदि उनके भाग्य में निर्धनता ही लिखी हुई है तो उसे कोई दूर नहीं कर सकता है। भाग्य का लिखा कोई नहीं मिटा सकता । विशेष—इस छन्द में भाग्य की प्रबलता का समर्थन किया गया है । उससे सुदामा के चारित्रिक वैशिष्ट्य का भी उद्घाटन होता है । (१५) शब्दार्थ—पैज = प्रतिज्ञा । बेरे = समय । जिहि बेरे = जिस समय । पटकोट = वस्त्रों का ढेर । चहुँ फेरे = चारों ओर । ग्राह = मगरमच्छ, घड़ियाल । गयंद = हाथी, यहाँ गजेन्द्र का अर्थ है । निहचै = निश्चय, विश्वास । लोचन कोर = एक नजर भर । हेरे = देखने से । व्याख्या—सुदामा के भाग्यवादी विचारों से असहमत होकर उसकी पत्नी कहने लगी कि श्रीकृष्ण सब कुछ कर सकते हैं। उनमें अलौकिक शक्ति है। जब हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र प्रह्लाद को खंभे में बाँध दिया था तब भगवान् श्रीकृष्ण ने ही प्रकट होकर प्रह्लाद की प्रतिज्ञा को पूर्ण किया था। चीरहरण के समय ज्यों ही द्रौपदी ने भगवान श्रीकृष्ण का हृदय में ध्यान किया, त्यों ही उन्होंने दुर्योधन की सभा में वस्त्रों का ढेर लगाकर उसकी लाज बचाई । उन्होंने ग्राह के फंदे में फंसे हुए हाथी की रक्षा की । हे स्वामी ! उसे तो श्रीकृष्ण की कृपा का पूर्ण विश्वास है । हमारी निर्धनता से हजार गुनी बड़ी निर्धनता भी उनकी एक कृपा-दृष्टि से दूर हो सकती है । वे सभी कुछ करने में समर्थ हैं । विशेष - इस छन्द में श्रीकृष्ण के अलौकिक रूप का प्रतिपादन हुआ है । वे सर्वशक्तिमान तथा भक्तवत्सल हैं । (१६) शब्दार्थ—चक्कवै = चक्रवर्ती राजा । चकिसे = चकित से, हैरान से भूप = राजा । किन्नर = एक प्रकार के देवता जो संगीत में प्रवीण होते हैं। जच्छ = यक्ष, कुबेर के गण । लौं = तक । ठाऊँ = स्थान । तैं = तूने । बिलोक्यौँ = देखा । लोकन के मुखिया = लोकों के स्वामी । पैठन पाऊँ = प्रवेश करने पाऊँ व्याख्या—सुदामा अपनी पत्नी के बार-बार कहने पर द्वारिकापुरी जाने में अपनी विवशता प्रकट करते हुए कहने लगे कि द्वारिका पहुँच जाना तो सरल