सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४ / सुदामा-चरित है, । पृथ्वी—किन्तु श्रीकृष्ण के दरबार तक पहुँचना सरल नहीं है । उनके महल के द्वार पर अनेक चक्रवर्ती राजा चकित-से होकर खड़े रहते हैं और कई राजा तो वहाँ इस प्रकार चुपचाप खड़े रहते हैं, मानो मार्ग भूलकर वहाँ आ गये हों। निवासियों की तो बात क्या, बड़े-बड़े देवता, गंधर्व, किन्नर, यक्ष भी प्रातः से सायं तक वहाँ खड़े रहते हैं, उन्हें द्वारिकापति श्रीकृष्ण के दर्शन नहीं हो पाते । उसने (सुबुद्धि) तो दरबार देखा नहीं इसलिए वह उसे वहाँ की महिमा समझाने में असमर्थ है। उनके दरबार के अन्दर तो लोकों के स्वामी भी नहीं जा सकते, उन्हें भी बाहर ही रुकना पड़ता है । द्वारिकाधीश के ऐसे भव्य दरबार में दीन-हीन, निर्धन सुदामा भला कैसे प्रवेश पा सकता है ? अर्थात् उसका वहाँ जाकर श्रीकृष्ण से मिलना सम्भव नहीं है । विशेष—इस छन्द में श्रीकृष्ण के भव्य दरबार की भव्य शोभा तथा महा- नता का उद्घाटन हुआ है और उसीके माध्यम से सुदामा अपनी विवशता व्यक्त करते हैं। (१७) शब्दार्थ—तिमि = उसी तरह । अन्तरजामी = अन्तर्यामी, मन की बात जानने वाले । तिहारी = तुम्हारी । सिख = शिक्षा । सुधि - खबर । व्याख्या—सुदामा-पत्नी श्रीकृष्ण को अन्तर्यामी बताकर अपने पति को निस्संकोच द्वारिकापुरी जाने का आग्रह करती हुई कहती है कि भगवान् श्री- कृष्ण अन्तर्यामी हैं। उसकी इस बात को वे मान लें। भले ही उनके द्वार पर अनेक राजा भूले हुए-से खड़े रहते हों, बड़े-बड़े चक्रवर्ती राजा, देव, गन्धर्व, किन्नर, यक्ष और लोकपाल भले ही उनके द्वार पर रोक दिये जाँय किन्तु आपके साथ ऐसा व्यवहार नहीं हो सकता । उसे इस बात का पूर्ण विश्वास है कि यदि वे द्वारिकापुरी जाएंगे तो श्रीकृष्ण सबको छोड़कर पहले उन्हीं की खबर लेंगे अर्थात् उनका पूर्ण स्वागत होगा और उन्हें मिलने के लिए कोई नहीं रोकेगा। विशेष—इस छन्द में सुदामा-पत्नी का यह तर्क अत्यन्त सार्थक तथा प्रभाव- शाली है कि श्रीकृष्ण अन्तर्यामी हैं और सुदामा को उन तक पहुँचने और मिलने में कोई बाधा नहीं आएगी। वस्तुतः सुबुद्धि का बुद्धि-कौशल सराहनीय है । (१८) शब्दार्थ—विलम्ब = देरी । सदाई = सदैव, सदा । याहि तें = इसी