सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुदामा-चरित / ६५ से । भावत = अच्छी लगती है । जौ जो । निबहै = निर्वाह होगा । सुरेसहु = इन्द्र । ठकुराई = प्रभुता, स्वामी होना । व्याख्या—सुदामा श्रीकृष्ण को दीनदयाल मानते हुए, उन्हीं के प्रेम तथा भक्ति को जीवन का सर्वस्व घोषित करता है । उसके विचार से भी श्रीकृष्ण के दरबार में पहले निर्धनों की ही सुनवाई होती है। उन्होंने द्रौपदी की लाज बचाने में, हाथी की मगरमच्छ से रक्षा करने में और प्रह्लाद की प्रतिज्ञा पूर्ण करने में, तनिक भी देर न की । वे वास्तव में दीनदयालु हैं, इसी से वह निर्धनता को पसन्द करता है । उसकी यह हार्दिक इच्छा है कि जिस प्रकार अब तक उन्होंने अपना जीवन व्यतीत किया उसी प्रकार शेष जीवन भी व्यतीत हो जाता तो बहुत अच्छा होता । यदि भगवान श्रीकृष्ण से प्रेम नहीं है तो इन्द्र देवता का पद भी व्यर्थ है । द्वारिकापुरी जाने से धन-वैभव तो अपार मिल सकता है किन्तु प्रभु-भक्ति में कमी आ जाने से वह सभी कुछ व्यर्थ होगा । फलतः इन्द्र देवता के पद से निर्धनता अच्छी है, जिसके रहते हम प्रभु-भक्ति बनाए रख सकते हैं । विशेष—इस छन्द में श्रीकृष्ण का दीनदयालु रूप तथा सुदामा का हरि- भक्त रूप साकार हो उठे हैं। सुदामा की निष्ठा तथा सच्चा भक्ति-भाव स्तुत्य है । (१६) शब्दार्थ—हितु = हितैषी, मित्र । पट = वस्त्र । जग्य = यज्ञ । पित्रई = बाप-दादा । विमुख -प्रतिकूल । अगरई = पहले से ही । केतौ = कितना । अलसात = आलस्य क्यों करते हो । विचित्रई = विचित्रता । जौ पै = जो कहीं । मित्रई = मित्रता । तौ पै = तो फिर । एते = इतने । व्याख्या—सुदामा-पत्नी अपने बुद्धि-कौशल का सदुपयोग करती हुई कहने लगी कि उन्होंने अब तक फटे-पुराने वस्त्र पहने, टूटी-फूटी झोंपड़ी में दिन व्यतीत किए, भिक्षा मांगकर भोजन किया और कभी इतना धन नहीं पाया कि यज्ञ अदि करके देवता-पितरों को संतुष्ट करते, फलतः वे सदैव प्रतिकूल रहे । भग- वान श्रीकृष्ण दीनबन्धु हैं, वे आपको दुखी देखकर दया करेंगे । वह यह बात पहले से ही जानती है कि श्रीकृष्ण आपको बहुत कुछ देंगे, फिर भी न जाने क्यों द्वारिकापुरी जाने में आप आलस्य कर रहे हैं । वहाँ जाने में आपको लज्जा