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सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

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६६ / सुदामा-चरित नहीं करनी चाहिए। विपत्ति पड़ने पर मित्र के पास जाना सर्वथा उचित है, इसमें किसी प्रकार की कोई विचित्रता नहीं है। कृष्ण जैसे दयालु तथा दानी से मित्रता होने पर भी यदि आप जीवन-भर निर्धनता में ही दिन काटें तो उनकी मित्रता किस दिन काम आएगी अर्थात् मित्रता की कसौटी तो यही है कि वह समय पर काम आए। इसलिए आपको अपनी मैत्री से लाभान्वित होना चाहिए। विशेष — इस छन्द में एक ओर सुदामा के दारिद्र्य का मर्मस्पर्शी वर्णन हुआ है। और दूसरी ओर उसकी पत्नी सुबुद्धि के बुद्धि वैभव का अति सुन्दर रूप देखने को मिलता है। उसके तर्क अत्यन्त सटीक तथा अकाट्य हैं। (२०) शब्दार्थ—नीकी = उचित, अच्छी। तैं = तुम। प्रीति सरसाइए = प्रेम बढ़ाना चाहिए। जेंइए = भोजन र्क जिए। आपहु = आप भी। जेंवाइए = भोजन कराइए। जोरि बैठत समाज भूप = राजाओं की सभा लगाकर। सकु- चाइए = लज्जा का अनुभव करना। व्याख्या—सुदामा अपनी पत्नी की बातों में अपना हित देखकर भी उनका समर्थन नहीं करता है। उसके विचार से उसकी पत्नी ने यद्यपि उसके हित की बात कही है कि वह धन-वैभव पाने के लिए द्वारिकाधीश के पास चला जाए किन्तु उससे मित्रता नष्ट हो सकती है। सच्ची मित्रता तो नित्य-प्रति विकसित होनी चाहिए। जब मित्र, मित्र से मिले हृदय प्रसन्न तथा आनन्दित होना चाहिए। ऐसी स्थिति में यह आवश्यक है कि यदि मित्र के घर जाकर भोजन किया। जाए तो उसे भी अपने घर बुलाकर भोजन कराना चाहिए। दोनों के जीवन-स्तर में समानता होनी चाहिए। श्रीकृष्ण महाराज हैं, बड़े-बड़े राजाओं का समाज उनके पास जुटता है। अपनी इस दीन-हीन दशा में जाकर, उन्हें लज्जित करना या स्वयं लज्जित होना समीचीन नहीं है। अपने भाग्य में ईश्वर ने जो सुख- दुःख के दिन लिख दिये हैं वे तो काटने ही पड़ेंगे किन्तु विपत्ति पड़ने पर दुःख के समय मित्र के द्वार पर कभी भी नहीं जाना चाहिए। विशेष—इस छन्द में सुदामा मित्रता के लिए समानता और स्वार्थहीनता को आवश्यक मानते हैं। अपनी इस धारणा के अनुसार द्वारिकापुरी नहीं जाना चाहते हैं।