सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुदामा-चरित / ६७ (२१) शब्दार्थ—विदित = प्रसिद्ध। चटसार = पाठशाला। कैयोवार = कितनी ही वार। लोचन अपार = असंख्य नेत्र, दिव्य दृष्टि वाले। सहस्रगुनी = हजार गुनी। व्याख्या—सुबुद्धि श्री कृष्ण के विभिन्न गुणों का उल्लेख करके अपने पति सुदामा को उनके पास जाने की प्रेरणा देती हुई कहती है कि वे ब्राह्मणों के भक्त हैं, संसार प्रसिद्ध दीनबन्धु अर्थात दीनों का पालन करने वाले हैं। वे महादानी हैं और सभी की सुधि लेने वाले हैं। कई बार आप कह चुके हैं कि वे आप के साथ एक ही पाठशाला में पढ़े हैं। यह कभी नहीं हो सकता कि असंख्य नेत्रों वाले श्रीकृष्ण आपको न पहचानें। आप दीन हैं, वे दीनबन्धु हैं। आप जैसा और कौन दीन-हीन होगा ? जिसे वे अपने मन में नहीं जानेंगे। श्रीकृष्ण आपका नाम सुनकर चार गुणा प्रेम मानेंगे, किन्तु आपके द्वार पर पहुचने पर उनकी प्रीति सौगुनी और आपको देख लेने पर सहस्रगुनी बढ़ जाएगी। ऐसी स्थिति में आपको द्वारिकापुरी अवश्य जाना चाहिए। विशेष—इस छन्द में श्रीकृष्ण के कृपालु, दीनबन्धु एव मित्र-वत्सल रूप को उभारा गया है। उसी का आश्रय लेकर सुबुद्धि अपने पति सुदामा को उनके पास भेजना चाहती है। (२२) शब्दार्थ—चूक = भूल, कमी। मों = मुझसे। पै दहँ = अवश्य देंगे। लायकै = लायक, योग्य। या विधि = इस प्रकार। पन द्वै = दो पन, आधी उम्र। बिरधापन = वृद्धावस्था, बुढ़ापा। केतो = कितना। होहुँ कनवड़ो = आभारी होऊँ कृतज्ञ होऊँ। व्याख्या—(सुदामा ने कहा—) श्रीकृष्ण वास्तव में बड़े प्रेमी हैं। उनके प्रेम में कोई कमी नहीं। यदि मैं उनके दर्शन करने जाऊँगा तो मुझे देखते ही वे उठ कर (मुझे) गले से लगा लेंगे। उनके द्वार पर जाने से वे मुझे कुछ धन-सम्पत्ति आदि भी अवश्य देंगे। (फिर भी मैं वहाँ जाना नहीं चाहता)। बाल्यावस्था और युवावस्था मैंने गरीबी में ही बिता दी। अब वृद्धावस्था आ गयी है। अब जीना ही कितने दिन है कि श्रीकृष्ण का अहसानमंद बनूँ। विशेष—इस छन्द में सुदामा का स्वाभिमानी व्यक्तित्व मुखरित हो उठा