सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८ / सुदामा-चरित है। वे आत्म-सम्मान के बदले धन-वैभव नहीं चाहते हैं। (२३) शब्दार्थ—ठाकुर = स्वामी। प्रसंग = विषय। हितू = मित्र। जिय में == हृदय में। कहा == क्या; व्यर्थ। सिधाइए = सिधारिये; जाइये। व्याख्या—(सुदामा की पत्नी ने कहा—) यदि दीनों पर दया करने वाले कृष्ण के समान मित्र मिल जायें तो उनका हजार बार अहसान मानने में कोई बुराई नहीं है। श्रीकृष्ण तीनों लोकों के स्वामी हैं। उनके दरबार में जाने में किसी तरह की लज्जा नहीं होनी चाहिये। हे नाथ! आप इधर-उधर की सब बातें छोड़कर मेरी बात मानें। साधारण मनुष्यों के द्वार पर जाने से क्या लाभ है? आप द्वारिकापति श्रीकृष्ण के यहाँ जाने के लिए प्रस्थान कीजिये। विशेष—इस सवैया छन्द में सुबुद्धि अपने बुद्धि-कौशल को प्रदर्शित करती हुई अपने पति सुदामा को श्रीकृष्ण के पास जाने और उनसे धन-वैभव प्राप्त करने की प्रेरणा देती है। उसका मुख्य तर्क यही है कि द्वार-द्वार भिक्षा माँगने से तो यह कहीं उत्तम है कि महादानी श्रीकृष्ण का द्वार खटखटाया जाये। (२४) शब्दार्थ—जाम == याम; प्रहर। जक == एक ही बात को बार-बार कहना; जिद्द। जा == यदि; जो। जो न कहौ करिए == यदि तेरा कहा न मानें। अपनी गति हेरे = अपनी दीन दशा देखकर। छरिया == द्वारपाल। तेरे == निकट। चाउर = चावल। व्याख्या—(सुदामा ने कहा—) आठो पहर तुम एक ही बात रटती हो, द्वारिका जाइये, द्वारिका जाइये। अगर तुम्हारी बात नहीं मानता हूँ तो तुम्हें दुःख होगा। पर अपनी दीन दशा देख कर कहीं जाने की इच्छा नहीं होती। श्रीकृष्ण के द्वार पर द्वारपाल खड़े रहते हैं। राजा भी उनके पास नहीं पहुँच पाते हैं। तुम इस बात पर भी तो विचार करो कि उन्हें भेंट देने के लिए मेरे पास पाँच सुपारी और चार चावल भी नहीं हैं। फिर, मैं उनके पास जाऊँ तो कैसे? विशेष—सुदामा अपना आत्म-सम्मान खोकर श्रीकृष्ण से धन-सम्पत्ति प्राप्त नहीं करना चाहते हैं, किन्तु पत्नी के सबल तर्कों को काटने में असमर्थ होकर अन्त में यह बहाना बनाते हैं कि श्रीकृष्ण को भेंट करने के लिए उसके पास न सुपारी है और न चावल।