सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५० / सुदामा-चरित (३०) शब्दार्थ—घसिकै = घिस कर। सुमिरिनी = जपमाला, जिससे मंत्रों की संख्या गिनने का काम लिया जाता है। दिव्य = अलौकिक; अति सुन्दर। द्वारावती = द्वारिकापुरी। व्याख्या—सुदामाजी ने चन्दन घिस कर माथे पर तिलक लगाया। हाथ में माला लेकर फेरी। इसके बाद द्वारिका के अलौकिक सौन्दर्य को देख मानो वे सनाथ हो गये। (३१) शब्दार्थ—दीठि = आँख; नजर; दृष्टि। सुवर्नमई = सुनहले; स्वर्ण- मय। सरस = सुन्दर; बढ़ कर। भौन = भवन; प्रासाद। साधि-साधि मौन = मौन साध कर। सुदामैं = सुदामा को। धाय = दौड़कर। पौरजन = पुरजन; नगर के लोग। गहे पाँय = पाँव पकड़ लिये। गौन = गमन। कहाँ कीन्ह गौन हैं = कहाँ जा रहे हैं; कहाँ चले हैं? धीरज अधीर के = दुखी को धीरज देने वाले। हरन पर पीर के = दूसरों के कष्टों का हरण करने वाले। बलबीर = श्रीकृष्ण। व्याख्या—द्वारिका के सुनहले महलों को देख कर सुदामाजी की आँखें चौंधिया गयीं। वहाँ के महल एक-से-एक सुन्दर थे। बिना पूछे वहाँ कोई किसी से बात नहीं करता था। देवताओं की तरह सभी मौन साध कर बैठे थे। (सुदामाजी को अनजान समझ) उन्हें देख कर नगरवासियों ने दौड़ कर उनके पाँव पकड़ लिये और पूछा—हे ब्राह्मण देवता! कृपा करके बतलाइये कि आप कहाँ चले हैं? सुदामा ने उत्तर दिया, अधीरों को धीरज देने वाले और दुखियों की पीड़ा तथा कष्ट को दूर करने वाले बलराम के भाई श्रीकृष्ण के महल कहाँ हैं? (मुझे वहीं जाना है।) विशेष—इस कवित्त में द्वारिकापुरी की अपार शोभा, उसके निवासियों का शान्त स्वभाव, शालीनता, ब्राह्मणों के प्रति श्रद्धा एवं प्रेम के साथ-साथ श्रीकृष्ण के दीनबन्धु रूप को चित्रित किया गया है। पूर्णोपमा अलंकार सौष्ठव भी द्रष्टव्य है। (३२) शब्दार्थ—काहू = किसी ने। कर गहि लीन्हौं आय = आकर हाथ पकड़ लिया। दीनदयाल = दीनदयालु। व्याख्या—दीन-हीन समझ कर एक व्यक्ति ने उनका हाथ पकड़ लिया और