भारतकोश
सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

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पृष्ठ 66

सुदामा-चरित / ७१ उन्हें श्रीकृष्णजी के राजप्रसाद के द्वार पर पहुँचा दिया । (३३) शब्दार्थ - द्विज = ब्राह्मण । दंड-प्रनाम - दण्डवत; अभिवादन; साष्टांग प्रणाम । भाषिए = कहिये । सकुल = वंश-परिचय सहित । व्याख्या - ब्राह्मण समझ कर द्वारपाल ने उन्हें प्रणाम किया और कहा - "हे ब्राह्मण ! कृपा करके अपने नाम और कुल का परिचय दीजिये (जिससे मैं आपके आगमन की सूचना श्रीकृष्ण तक पहुँचा दूँ) । (३४) शब्दार्थ- ब्रजराज = ब्रज के राजा; श्रीकृष्ण । गाथा = गाथा; वृत्तान्त । व्याख्या - सुदामा ने द्वारपाल से कहा, मेरा नाम सुदामा है । मैं श्रीकृष्ण के साथ पढ़ता था। मैं ब्राह्मण-वंश का हूँ । इतना सुनकर श्रीकृष्ण सब कुछ समझ जायेंगे । (३५) शब्दार्थ- चलि तहँ गयो = वहाँ चला गया । हाथ जोरि = हाथ जोड़ कर । बोल्यौ = बोला । व्याख्या - द्वारपाल ने श्रीकृष्ण के पास जाकर, हाथ जोड़ कर और शीश नवा कर कहा - । (३६) शब्दार्थ - पगा = पगड़ी । झगा = अँगरखा; कुर्ता । तन = शरीर । को = कौन । जाने को आहि = न जाने कौन है । केहि = किस । बसै केहि ग्रामा = न जाने किस गाँव में रहता है । लटी-दुपटी = पुराना फटा हुआ दुपट्टा । उपानह = जूता । पाँय = पाँव में । पाँय उपानह की नहिं सामा = पैरों में जूते भी नहीं हैं। रह्यो चकि = विस्मय से चकित हो रहा है। वसुधा = धरती; स्थान; भवन । अभिरामा = अभिराम; सुन्दर । रह्यो चकि सों वसुधा अभिरामा = यहाँ का वैभव देख कर चकित हो रहा है । धाम = महल; मकान । व्याख्या - हे प्रभु ! द्वार पर एक बहुत दुबला-पतला ब्राह्मण खड़ा है । उसके माथे पर न पगड़ी है, न देह पर कुर्ता । न जाने कौन है, कहाँ घर है ? वह एक फटी-पुरानी धोती पहने है। उसके पैरों से जूते भी नहीं हैं। बड़ी देर से वह यहाँ का वैभव देखकर चकित हो रहा है । वह आपके महलों का पता पूछ रहा है और अपना नाम 'सुदामा' बताता है । विशेष - इस सवैया छन्द में सुदामा की दयनीय स्थिति का अत्यन्त मर्म-