सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२ / सुदामा-चरित स्पर्शी चित्रण हुआ है । कविवर नरोत्तमदास ने उसकी दीन-हीन दशा तथा मनः- स्थिति के उद्घाटन में अपना कवि-कौशल प्रकट किया है । (३७) शब्दार्थ-द्वारपालक = द्वारपाल; दरवान । छांड़े = छोड़कर । जी की गति = हृदय की दशा । को = कौन । धाय = दौड़ कर । गहे पाँय = पैर पकड़ लिये । भेंटे लपटाय = गले से लिपट कर मिले । ऐसे दुख सानै कौं = दुःख में इस प्रकार कौन सम्मिलित होता है । कुसल = कुशल । विपदा = पहिचानै को = इस विपत्ति में तुम्हारे बिना कौन पहचान सकता है ? जैसी तुम करी = मानै को = हे दया के सागर ! जैसा प्रेमपूर्ण व्यवहार तुमने मेरे साथ इस विपत्ति में किया वैसा दूसरा कौन कर सकता है ? व्याख्या—जैसे ही कृष्ण ने द्वारपाल के मुख से सुदामा ब्राह्मण का नाम सुना, वैसे ही सब काम-धाम छोड़ कर हाथ जोड़े और दौड़ पड़े । उस समय उनके हृदय की दशा कैसी रही होगी, इसे बतलाया नहीं जा सकता । उन्होंने सुदामा के पैर पकड़ लिये और उन्हें गले से लगा लिया । दुःख में इस प्रकार सम्मिलित कौन होता है ? सुदामा की दीन दशा देखकर श्रीकृष्ण की आँखों में आँसू भर आये । उन्होंने सुदामा से कुशल समाचार पूछा । सुदामा ने कहा, (मैं विपत्ति में हूँ) तुम्हारे सिवा, इस विपत्ति के समय और मुझे पहचानता ही कौन ? हे दया के सागर ! जैसा प्रेमपूर्ण व्यवहार तुमने मेरे साथ किया वैसा दूसरा और कौन कर सकता है ? दीन-दुखियों पर ऐसी कृपा तुम्हारे सिवा और कोई नहीं कर सकता । विशेष—इस कवित्त में श्रीकृष्ण की आदर्श-मैत्री के भव्य रूप का निरूपण हुआ है । वे अपने बाल-सखा सुदामा का नाम सुनते ही बड़े उत्साह के साथ उसका स्वागत करते हैं । उसे गले लगकर मिलते हैं, उसकी दयनीय स्थिति को देखकर अपनी आँखों में आँसू भर उसका कुशल समाचार पूछते हैं । धन्य है यह आदर्श मित्र-वत्सलता । स्वभावोक्ति अलंकार का सौष्ठव भी दर्शनीय है । (३८) शब्दार्थ—लोचन = आँख; नैन । पूरि = भरी । लोचन पूरि रहे जल सो = आँखें आँसू से भर गयीं । दूरि तैं = दूर से ही । दुख मेट्यो = दुःख हो गया । सुरनायक = इन्द्र । हिय माँझ = हृदय में । कलपद्रुम = नन्दनवन का वृक्ष-