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सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

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सुदामा-चरित / ७३ विशेष, जो मनोवांछित फल देता है। खेट्यौ = खटका हुआ, आशंका हुई। कम्प...सरसो = कुबेर का कलेजा काँपने लगा। परसो पग = पैर छूते ही। जात...समेट्यौ = सोने का सुमेरु सिकुड़ने लगा। राउ = राजा। अंक भरि = अँकवार भर कर। रमापति = विष्णु, कृष्ण। व्याख्या—श्रीकृष्ण ने नेत्रों में जल भर कर जब सुदामा की ओर दूर से देखा, तभी सुदामा के सारे दुःख दूर हो गये। जब उन्होंने सुदामा के पैर पकड़े तब इन्द्र के मन में यह भय हुआ कि कहीं भगवान् इन्द्रासन ही सुदामा को न दे दें। कल्पवृक्ष के मन में यह खटका हुआ कि कहीं हमें ही न भगवान् दान कर दें। कुबेर का हृदय यह सोच कर काँप उठा कि कहीं भगवान् त्रिभुवन की सारी सम्पत्ति सुदामा को न दे दें। सोने का पर्वत सुमेरु जैसे अपने-आप में सिकुड़ने लगा कि कहीं उपहारस्वरूप वही न भेंट कर दिया जाय। (मगर अब देना शेष ही क्या रह गया था) जब श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपनी भुजाओं में प्रीतिवश भर लिया, तभी वे भिखारी से राजा हो गये। [कवि ने परोक्ष-रूप से यहाँ यह संकेत किया हैं कि श्रीकृष्ण वास्तव में तीनों लोकों के स्वामी हैं, इन्द्र, कुबेर आदि उनके इशारे पर चलने वाले सेवक हैं। उनके दर्शन से ही सांसारिक कष्ट दूर हो जाते हैं और उनकी कृपा से सारी सम्पदा प्राप्त हो जाती है।] विशेष—इस सवैया छन्द में श्रीकृष्ण के अलौकिक रूप की ओर संकेत किया गया है। वे तीनों लोकों के स्वामी हैं, इन्द्र, कुबेर आदि उनके संकेतों पर कार्य करते हैं, उनके दर्शन-मात्र से ही सभी सांसारिक कष्ट दूर हो जाते हैं और वे अपार धन-वैभव प्रदान करने वाले हैं। इसके अतिरिक्त इस छन्द में चंचलाति- शयोक्ति एवं परिकर अलंकार का भी सुन्दर प्रयोग देखा जा सकता है। (३६) शब्दार्थ—त्रिभुवन = तीनों लोक। राय = राजा। अंतःपुर = रनि- वास, रंगमहल। भेंटि = मिल कर। भली विधि = अच्छी तरह। त्रिभुवन- राय = श्रीकृष्ण। दूजो = दूसरा। व्याख्या—सुदामा से अच्छी तरह मिल-भेंट कर श्रीकृष्ण हाथ पकड़ कर उन्हें महल के भीतर ले गये, जहाँ श्रीकृष्ण के सिवा दूसरा कोई पुरुष नहीं