सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४ / सुदामा-चरित जो सकता था । (४०) शब्दार्थ—मनिमंडित = जिसमें मणियाँ जड़ी हों । कनक = सोना । ता = तिस । पगधोवन को = पैर धोने के लिए । व्याख्या—श्रीकृष्ण ने सुदामा को मणि-जटित सोने की चौकी पर बैठाया और उनके पैर धोने के लिए स्वयं ही एक परांत में पानी भर कर रखा । (४ ) शब्दार्थ—राज-रमनि = रानियाँ (राज-रमणि) । सोलह-सहस = सोलह हजार । सह-सेवकन = दास-दासियों के साथ । पटरानी = प्रधान रानी । चितै = देखकर । हेत = प्रेम । स-मीत = सखियों के साथ । व्याख्या—यह देख कर आठों पटरानियाँ, सोलह हजार रानियाँ और सहायिकाएँ चकित हो गयीं । (४२) शब्दार्थ—जिनके चरनन को सलिल = जिनके चरणों का जल । हरत जगत-संताप = संसार का दुःख दूर करता है । (यहाँ संकेत इस बात की ओर है कि गंगा का उद्गम विष्णु के चरणों से हुआ है ।) तें = वे । आप = स्वयं ही । व्याख्या—(कवि कहता है) जिन परब्रह्म—श्रीकृष्ण के चरणों का जल (गंगाजी) संसार के कष्टों को दूर करता है, वे स्वयं आज सुदामा ब्राह्मण के चरण धो रहे हैं । (४३) शब्दार्थ—बेहाल = बुरी दशा, दुखी । बेवाइन = बिवाई, पैर की एड़ियाँ फटने की स्थिति । कंटकजाल = काँटों का छत्ता, काँटों का समूह । पुनि = फिर । जोए = देखे । इतै = यहाँ । कितै = कहाँ । कितै दिन खोए = कहाँ इतने दिन बिताये । करुना करिकै = करुणा से अभिभूत हो कर । करुनानिधि = करुणा के सागर, कृष्ण । पग = पैर । व्याख्या—(धोने के लिए जब श्रीकृष्ण ने सुदामा के पैर उठाये तो उन्होंने देखा कि) बिवाइयों से सुदामा के पैरों के तलुए फटे हुए हैं और उनमें सैकड़ों काँटे चुभे हुए हैं । (पैरों की इस दुर्दशा से श्रीकृष्ण ने सुदामा के कष्टों का अनु- मान कर लिया) । उन्होंने रो कर कहा—हे मित्र, तुमने बहुत दुःख पाया है । न मालूम तुम कहाँ भटकते रहे । तुम यहाँ क्यों नहीं आये? सुदामा की दीनदशा