भारतकोश
सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

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सुदामा-चरित / ७५ देख कर करुणा से अभिभूत हो श्रीकृष्ण इतना रोये कि परात का पानी छूने की आवश्यकता ही न पड़ी, आँखों से बही हुई जल-धारा से ही उन्होंने सुदामा के पैर धो डाले । विशेष — यह सवैया 'सुदामाचरित' के मार्मिक छन्दों में से एक है । इसमें सुदामा के दारिद्र्य का हृदय-विदारक चित्रण और श्रीकृष्ण की आदर्श-मैत्री का मर्म-स्पर्शी निरूपण हुआ है । अनुप्रास अलंकार का अति स्वाभाविक प्रयोग भावों को प्रभावशाली बनाने में बड़ा उपयोगी रहा है । (४४) शब्दार्थ—पट-पीत = पीत पट, पीताम्बर, पीला वस्त्र । सतिभामा = सत्यभामा (श्रीकृष्ण की एक पटरानी) । व्याख्या—सुदामा के पैर धो कर श्रीकृष्ण ने अपने पीताम्बर से उन्हें पोंछा और सत्यभामा से कहा—तुम जा कर इनके लिए भोजन तैयार करो । (४५) शब्दार्थ—तंदुल = चावल । तिय = स्त्री । दीन्हें हते = दिये थे । आगे धरियो जाय = जा कर भेंटना । विभव = वैभव, ऐश्वर्य । व्याख्या—इस प्रकार जब सुदामा निश्चिंत हुए तो उन्हें याद आया कि उनकी पत्नी ने श्रीकृष्ण को भेंट देने के लिए चावल दिये थे । पर यहाँ का राजसी ठाट-बाट देख कर उन्हें वह भेंट देने में संकोच हो रहा था । (४६) शब्दार्थ—रीति = ढंग, पद्धति, मनोदशा । सुहृद = मित्र । प्रगट = प्रकट, प्रत्यक्ष । व्याख्या—भगवान् श्रीकृष्ण अन्तर्यामी है । भक्त सुदामा के मन का संकोच उन्होंने जान लिया । अपने मित्र सुदामा ब्राह्मण से प्रत्यक्ष रूप में उन्होंने इस प्रकार अपना प्रेम प्रकट किया— (४७) शब्दार्थ—कछु = कुछ । काहे न देत = क्यों नहीं देते ? पोटरी = गठरी । चाँपि रहे = दबा रहे हो, छिपाये हो । काँख = बगल । हेत = हेतु, कारण । व्याख्या—श्रीकृष्ण ने विनोद करते हुए कहा, भाभी ने मेरे लिए जो कुछ भेंट दी है उसे देते क्यों नहीं ? पोटली को काँख में क्यों दबा रखा है ? (४८) शब्दार्थ—आगे = पहले । गुरु-मातु = गुरु की पत्नी । ते = तिसको ।