सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८ / सुदामा-चरित श्रीकृष्ण जब अपने मित्र सुदामा की स्नेह-भेंट चावलों को खाने लगते हैं तो लक्ष्मी, ऋद्धि, सिद्धि, इन्द्र, कुबेर आदि सभी चिंतित हो उठते हैं। उनकी चिंता का कवि ने अति स्वाभाविक निरूपण किया है। अतिशयोक्ति अलंकार के प्रयोग से भावोत्कर्ष में अच्छी सहायता मिली है। (५२) शब्दार्थ— हूल = घबड़ाहट; पीड़ा। हियरा में = हृदय में। कानन = कानों में। टेर = पुकार, आवाज। भेंटत सुदामैं···आघात ही— (१) सुदामा ने भेंटस्वरूप जो चावल दिया उसे चाव से खाते हुए कृष्ण नहीं अघाते हैं। (२) कृष्ण सुदामा से मिलते हैं और चावल चबा कर अघाते नहीं हैं। सोर भयौ = हल्ला मच गया। ठाढ़ी = खड़ी-खड़ी। थरहरैं = काँपती हैं। तहीं = उसी जगह। नाक लोक— स्वर्ग लोक। नाग लोक— पाताल लोक। ओक-ओक— घर घर। थोक-थोक = समूह के समूह, टोली की टोली। गातहीं = शरीर। हालो परो = हल्ला मच गया। थोकन में = झुंड और समूह में। लालो परो लोकन मैं = लोकों में त्रास छा गया; अकाल पड़ गया। चालो परो चक्रन में— (१) जन्म के दरिद्र सुदामा का आज भाग्य पलट रहा है; वह रंक से राजा होने जा रहा है। इससे कालचक्र भी चलायमान हो गया। (२) चारों ओर उथल-पुथल मच गई। व्याख्या—कानों-कानों में यह बात फैल गई कि श्रीकृष्ण ने सुदामा जैसे दीन का बहुत आदर-सत्कार किया और वे अब उससे भेंटस्वरूप मिले। साधारण चावल ऐसी रुचि से चबा रहे हैं कि अघाते ही नहीं। सबके हृदय में एक घबरा- हट-सी हुई। नरोत्तमदास कहते हैं कि समृद्धि और सफलता की अधिष्ठात्री ऋद्धि-सिद्धियों में कोलहल सा मच गया। (अपने पति भगवान् की यह अप्रत्याशित विरक्ति देखकर) लक्ष्मीजी वहीं खड़ी-खड़ी काँपने लगीं। स्वर्ग में पाताल में, घर-घर में, झुण्ड-झुण्ड में इस अनहोनी घटना की खबर फैल गई। इस संवाद से सबके मुख सूख गए और सब काँपने लगे। श्रीकृष्ण के चावल चबाते ही देव-समूह में हल्ला मच गया कि अब क्या होगा? लोक-लोक में अकाल पड़ गया (क्योंकि अधिकांश समृद्धि भगवान् ने सुदामा को दे दी)। श्रीकृष्ण की यह लीला देखकर कालचक्र भी विचलित हो उठा। (जिस सुदामा के भाग्य में