सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुदामा-चरित / ७६ इतनी दरिद्रता लिखी थी, वह दो मुट्ठी चावल खिलाकर आज अपार सम्पत्ति का मालिक होने जा रहा है, अतः अपनी परवशता पर काल का विचलित हो उठना स्वाभाविक ही है।) विशेष—इस कवित्त में भावानुकूल भाषा का प्रयोग, कहावतों तथा अनु- प्रासों का सौष्ठव भाव को प्रभावोत्पादक बनाने में अत्यन्त उपयोगी रहा है। इसमें भाव एवं कला का एक साथ सौन्दर्य द्रष्टव्य है। (५३) शब्दार्थ—भौन—भवन। पकवान—पूरी कचौड़ी आदि। निधि— खजाना। सुषमा—सुन्दरता। अभिलाषत—चाहते हैं। दाख—मुनक्का, अंगूर न चाखत—चखते तक नहीं। सिंधु छमा के—क्षमा के सागर, श्रीकृष्ण। सेर- पावक—लगभग पाव भर। समा—साँवाँ; एक प्रकार का चावल। कंत रमा के = लक्ष्मी-पति; विष्णु; कृष्ण। व्याख्या—(श्रीकृष्ण को सुदामा के साधारण चावलों को चबाते देखकर लोग आपस में कहने लगे) सौन्दर्य के भण्डार, श्रीकृष्ण के महल तरह-तरह की मिठाइयों और पकवानों से भरे पड़े हैं। साँझ-सवेरे उनके माता-पिता बड़े दुलार से उनसे मिठाई-पकवान खाने का आग्रह करते हैं। पर क्षमा के सागर श्रीकृष्ण अंगूर भी नहीं चखते। (कहने का तात्पर्य यह है कि मेवा-मिठाई में भी श्रीकृष्ण की रुचि नहीं।) प्रीति की रीति को क्या कहा जाय; एक दुखिया ब्राह्मण एक पाव साँवाँ जैसे मोटा चावल लाया है, (मेवा-मिठाई में भी रुचि नहीं लेने वाले) श्रीकृष्ण उन मोटे चावलों को बड़े प्रेम से बैठे चबा रहे हैं। विशेष—इस सवैया छन्द में श्रीकृष्ण की आदर्श-मैत्री का निरूपण हुआ है। वे नाना प्रकार के पकवान छोड़कर मित्र के द्वारा भेंट किए गए चावल जिस प्रेम-भाव से चबाते हैं, उसमें मैत्री-आदर्श का चरमोत्कर्ष देखा जा सकता हैं। विषम अलंकार का प्रयोग भी भावों को प्रभावोत्पादक बनाने में बड़ा उप- योगी रहा है। (५४) शब्दार्थ—रुकुमिनि=रुक्मणी कृष्ण की आठ पटरानियों में एक। अनचाह=अनिच्छा; उदासीनता। व्याख्या—(दो मुट्ठी चावल खाने के बाद) श्रीकृष्ण ज्योंही तीसरी मुट्ठी