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सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

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पृष्ठ 77

८२ / सुदामा-चरित कुबेर उनके सामने प्रणत हैं। जन्म का दरिद्र ब्राह्मण अपने स्वप्न में इतना ऐश्वर्य देख कर चौंक पड़ा ! [अपने घर वापस लौटने पर सुदामा ने इस स्वप्न की चर्चा अपनी पत्नी से की है। वे कहते हैं— “दिन-प्रति अधिक सनेह सों, सपन दिखायो मोहि। सो देख्यो परतच्छ ही, सपन न निसफल होंहि ॥”] विशेष—इस सवैया छन्द में श्रीकृष्ण के अलौकिक रूप को सांकेतिक किया गया है। इसी से वे अपने भक्त सुदामा को एक असाधारण स्वप्न का दर्शन कराते हैं। उदात्त अलंकार का सौन्दर्य भावों के उत्कर्ष में पूर्ण सहयोग देता है। (६१) शब्दार्थ—देनो हुतो = जो देना था। गाथ = गाथा; कथा; रहस्य । बेर = बेला; समय । व्याख्या—श्रीकृष्ण ने सुदामा को जो कुछ देना था सो दे दिया। (सुदामा ने उस ऐश्वर्य को स्वप्न में देखा भी ।) परन्तु सुदामा इस रहस्य को नहीं समझ सके। चलते समय श्रीकृष्ण ने प्रत्यक्ष रूप में उन्हें कुछ न दिया। (६२) शब्दार्थ—पुनकनि—प्रसन्नता; रोमांच होना; उमंग; उत्साह। वह पुलकनि भाँति—श्रीकृष्ण का उत्साह और उमंग से उठ कर आदरपूर्वक ललक कर सुदामा से गले मिलना। भाँति—रीति। पठवनि—विदाई; भेजना। यह पुनकनि—और यह (बिना कुछ दिये) विदा करना। व्याख्या—(चलते समय श्रीकृष्ण ने सुदामा को प्रत्यक्ष रूप में कुछ न दिया। यह सोच कर सुदामा को बड़ा पछतावा हुआ। रास्ते में वे सोचने लगे) श्रीकृष्ण का रहस्य कुछ समझ में नहीं आता। कहाँ तो प्रेम से अत्यन्त पुलकित होकर आतुरता तथा उमंग से उन्होंने मेरा स्वागत किया और कहाँ इस तरह खाली हाथ विदा कर दिया ! (अगर अन्त में उन्हें मेरे साथ इतना निष्ठुर व्यवहार करना था तो उन्होंने पहले मेरे प्रति इतना प्रेम प्रदर्शित क्यों किया ?) (६३) शब्दार्थ—कर ओड़त फिरे = हाथ पसारे फिरे। तनक = थोड़ा । काज = लिये; कहा भयो ॰॰॰ राज समाज = अब कृष्ण को राजपाट मिल गया तो

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