सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुदामा-चरित / ८१ भोजन के पश्चात् मीठी वस्तु खाने से पाचन शक्ति ठीक रहती है। आनि = ला कर। कन्द = मिसरी। व्याख्या—(श्रीकृष्ण और सुदामा जब खाने बैठे तब उन्हें) चाँदी की सुन्दर थाली में मिश्री सहित खीर परोसी गई, जो शरद् ऋतु के चन्द्रमा से भी अधिक स्वच्छ थी। दूसरी थाली में दाल-भात, गाय का सुगन्धित घी और फूले हुए फुलके परोसे गये। फूल-फूले फुलकों के सामने श्वेत कमलों की शोभा भी मंद पड़ गई। पापड़, मुँगौरी, बड़ा इत्यादि तरह-तरह के व्यंजन परोसे गए। भोजन के अन्त में श्रीखंड या सिखरन परोसी गई। श्रीकृष्ण ने अपने मित्र सुदामा को ऐसे प्रेम से भोजन कराया कि देवता भी वह प्रीति देखते ही रह गये। विशेष—इस कवित्त में श्रीकृष्ण द्वारा मित्र सुदामा को दिये गये अपार आदर; सत्कार, अनेक प्रकार के स्वादिष्ट भोजनों आदि का अति सुन्दर निरूपण हुआ है। प्रतीप अलंकार का सौष्ठव भी द्रष्टव्य है। (५६) शब्दार्थ विधि = प्रकार। चित चल्यौ = इच्छा हुई। बनाव = वर्णन। व्याख्या—इस तरह सात दिन सुदामाजी द्वारिका में रहे। प्रतिदिन उन्हें श्रीकृष्ण की ओर से अधिक सम्मान मिलता रहा। तब उन्हें घर वापस लौटने की इच्छा हुई। आगे उसका वर्णन सुनिये। (५०) शब्दार्थ—दाहिने = दायीं ओर। चतुरानन = ब्रह्मा। सामुहें = सम्मुख सामने। महेस = महेश; शंकर। दुऔ = दोनों। कर = हाथ। सुरेस = इन्द्र। ऐतइ बीच = इसी बीच में। पायन = पांवों पर। आय = आ कर। विभौ = वैभव। वपुरो = बेचारा। व्याख्या—(जाते समय श्रीकृष्ण ने सुदामा को सब कुछ दे दिया। परन्तु प्रत्यक्ष रूप में सुदामा को दान की सूचना न देकर उन्होंने एक स्वप्न में उन्हें सारे ऐश्वर्य की झलक-सी दिखा दी) जाते समय सुदामा ने स्वप्न में देखा,— ब्रह्मा उनकी दाहिनी ओर वेद पढ़ रहे हैं, सामने शंकर ध्यान लगाये हैं, बायीं ओर सब देवताओं के साथ इन्द्र हाथ जोड़े खड़े हैं और विविध ऐश्वर्य लिए