सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८४ / सुदामा-चरित बचपन के मित्र हैं, अतः मैं उन्हें शाप क्या दूं ? केवल इतना ही कहता हूँ, जैसा उन्होंने मुझे दिया, वैसा ही उन्हें भी मिले। (६६) शब्दार्थ—नौ गुनधारी=नौ गुण धारण करने वाला; नौ तागे का जनेउ धारण करने वाला; ब्राह्मण सुदामा। छगुनं=ब्राह्मणों के छः गुण अध्ययन, अध्यापन, यजन, याजन, दान और प्रतिग्रह। तिगुना मध्ये—तीन गुणों—यजन, पठन, और दान वाले क्षत्रियों के बीच। जाय=जा कर। लायौ =लाया। चापल—(चापल्य)=चंचलता; विकलता। चौगुनी=काम, क्रोध, मद, लोभ इन चार लक्षणों वाला। ओंठों गुननि=ज्ञान के साधन—विवेक, वैराग्य; षट्-सम्पत्ति (शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा और सामाधान); मुमुक्षा, श्रवण, मनन, निदिध्यासन और समाधि। विशेष—इस दोहे में सुदामा के खाली हाथ लौटने पर उनके मन के संताप, पश्चाताप तथा अहं का अत्यन्त मनोवैज्ञानिक निरूपण हुआ है। (६७) शब्दार्थ—और कहा कहिए=और क्या कहूँ। कंचन—सोना। निपट—एक दम। कठिन—कठोर। हृदय। मोको—मुझे। दाम—कौड़ी; छदाम। व्याख्या=(सुदामा फिर मन में सोचने लगे—) और क्या कहूँ जहाँ सोने के ही महल हैं, उस द्वारिका के स्वामी श्रीकृष्ण का हृदय इतना कठोर है कि उन्होंने आते वक्त मुझ जैसे दरिद्र को एक छदाम भी नहीं दिया। (६८) शब्दार्थ=रतनन=रतनों से। लाग=दोष। लाग आपने भाग को =अपने भाग्य का ही दोष है। काको=किसको। व्याख्या=(सुदामा सोचते हैं) श्रीकृष्ण के यहां न जाने कितने भंडार हैं जिनमें बहु-मूल्य रत्न भरे पड़े हैं (परन्तु उन्होंने मुझे कुछ भी नहीं दिया)। (अन्त में वे यह सोच कर अपने आप को सान्त्वना देते हैं कि) यह सब अपने भाग्य का दोष है, इसमें श्रीकृष्ण का क्या दोष है? अर्थात् मेरा भाग्य ही खोटा है, मैं श्रीकृष्ण को क्या दोष दूं? (६६) शब्दार्थ—इमि=इस तरह; इस प्रकार। झखत=पछताते हुए; झुंझलाते हुए। पुन-तीर=गाँव के निकट। दीठि=नजर; दृष्टि। हय=घोड़ा।