सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुदामा-चरित / ८७ नगर है।) तरह-तरह के वस्त्राभूषणों से सजी हुई ब्राह्मणी* को देख कर उन्हें और भ्रम हो गया कि यह उनका नगर नहीं। वे घबड़ा गये और सोचने लगे, यहाँ से अब अवश्य मैं निकाला जाऊँगा, यह तमाशा भी लोग देखेंगे । (सुदामा को क्या पता था कि) उनके श्रीकृष्ण के दर्शन मात्र से ही सुदामापुरी की कायापलट हो गयी और अब वह द्वारिकापुरी से भी अधिक सुन्दर हो गयी है। विशेष—इस कवित्त में श्रीकृष्ण की दानशीलता के फलस्वरूप बने सुदामा के भव्य भवन का अति सुन्दर वर्णन हुआ है। वर्णनात्मक शैली सौष्ठव के साथ- साथ उदात्त एवं उत्प्रेक्षा का सौन्दर्य भी द्रष्टव्य है। (७४) शब्दार्थ—कनक-दंड = सोने की छड़ी। सबनि = सबने ले कर । व्याख्या—(नगर-निवासियों ने एक महल के सामने सुदामा को ले जा कर खड़ा किया) जिसके द्वार पर सोने का दंड हाथ में लिए हुए द्वारपाल खड़ा था। उन लोगों ने सुदामा से कहा = यही आप का महल है। (७५) शब्दार्थ—हँसत हौ = दिल्लगी करते हो। ह्वै करि परम प्रवीन = बहुत चालाक हो कर या अपने को बहुत चालाक समझ कर । व्याख्या—(उस महल और द्वारपाल को देख कर सुदामा ने उन लोगों से कहा—) आप लोग अत्यन्त चतुर हो कर भी मुझ दीन ब्राह्मण के साथ दिल्लगी क्यों कर रहे हैं ? मुझे मेरी वह झोपड़ी दिखलाइये जहाँ मेरी दीन- *कुछ लोगों के विचारानुसार ब्राह्मणी से यहाँ तात्पर्य सुदामा की पत्नी से है। परन्तु सुदामा की पत्नी को सुदामा के आने की खबर पीछे मिलती है, जैसा कि इस दोहे से स्पष्ट है— “सुनत चली आनंदयुत, सब सखियान लै संग । नूपुर किंकिनि, दुँदभी, मनहुँ काम चतुरंग ॥” यह स्पष्ट नहीं हो पाता है कि ‘बाँभनी’ शब्द यहाँ किसके लिए आया है। अगर ‘बाँभनी’ से तात्पर्य किसी ब्राह्मण की स्त्री से है तो सुदामा का, परस्त्री को आभूषणों से लदी देख कर घबड़ा जाना युक्तिसंगत नहीं मालूम होता ।