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सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

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पृष्ठ 83

८८ / सुदामा-चरित दुखिया ब्राह्मणी रहती है। (७६) शब्दार्थ—सो = से। तिन = उन्होंने। कहि पठवहु = कहला भेजो। व्याख्या—नगर-निवासियों ने द्वारपाल से कहा—भीतर (सुदामा की पत्नी के पास) खबर भिजवा दो कि ब्राह्मण-देवता आ गये हैं। अपने पति का दर्शन कर सनाथ सो जाओ। (इसका अर्थ इस प्रकार भी हो सकता है— भीतर यह खबर भिजवा दो, ब्राह्मणदेवता आ गये हैं कि ब्राह्मणी उनका दर्शन कर कृतकृत्य हो जायें।) (७७) शब्दार्थ—नूपुर = पेंजनी। किंकिनि—किंकिणी = करधनी; कमर- कस। दुंदभी = दुन्दुभी, नगाड़ा। मनहु काम चतुरंग = मानो कामदेव की चतुरं- गिणी सेना। चतुरंगिनी = चार अंगों (हाथी, घोड़े, रथ और पैदल) वाली सेना। व्याख्या—ब्राह्मणी वह सूचना पाकर बहुत प्रसन्न हुई और अपनी सखियों के साथ पाजेब, करधनी की घंटिकाओं की ध्वनि करती हुई, नगाड़े के संगीत के बीच इस प्रकार द्वार की ओर चली मानो कामदेव की चतुरंगिणी सेना आ रही हो। विशेष—इस दोहे में श्रीकृष्ण की अपार कृपा से धन-वैभव पाने वाली सुदामा-पत्नी की साज-सज्जा का अलंकृत वर्णन हुआ है और उत्प्रेक्षा अलंकार उस सौष्ठव की वृद्धि में सहायक है। (७८) शब्दार्थ—कंत = पतिदेव। गेह = घर। व्याख्या—ब्राह्मणी ने सुदामा से आ कर कहा—हे नाथ! यही अपना घर है। श्रीकृष्ण ने इस प्रकार हमारी दरिद्रता का नाश करके तीनों लोकों में अपनी मैत्री-प्रेम को प्रकट किया है। (७६) शब्दार्थ—जनि = मत। जनि कहो = न कहो। सँभारि = सँभाल कर; सोच-विचार कर। इहैं = यहीं पर। कुटी मेरी हती = मेरी झोपड़ी थी। बापुरी = बेचारी। व्याख्या—(सुदामा अपनी पत्नी को पहचान न सके। अपने सामने एक पटरानी को खड़ी देख कर और उसके द्वारा पति सम्बोधन सुन कर वे बहुत चकमकाये। उन्होंने कहा—) तुम सोच-समझ कर बोलो; मुझे अपना पति मत