सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुदामा-चरित / ८६ कहो। (हाँ,) यहीं पर मेरी झोपड़ी थी जिसमें बेचारी मेरी दुखिया पत्नी रहती थी। (८०) शब्दार्थ—तिहारियै=आपकी ही; तुम्हारी ही। सुधि सँभारिए= होश कीजिये; याद कीजिये। प्रभुता=प्रभुत्व। श्री भगवंत=श्रीकृष्ण। व्याख्या। (पति का शंका दूर करने के लिए सुदामा की पत्नी ने कहा—) हे नाथ ! होश सँभालिये, जरा ध्यान से देखिये, मैं आपकी ही स्त्री हूँ। यह सब धन-सम्पत्ति और सुन्दरता भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा से प्राप्त हुई है। (८१) शब्दार्थ—परी हुती=पड़ी हुई थी। तामैं=उसी में। दुःख काटौं =दुःख के दिन बिताते थे। हेम-धाम=सोने का घर। जेवर-जराऊ=जड़ाऊ गहने। साजे=पहने। छूछी=खाली; बिना गहनों की। छाम=क्षीण। सारी- जरतारी=साड़ी जिस पर ज़री का काम किया हुआ हो। कारी=काली। कामरी=कम्बल। पड़ाइन=पड़िवाइन; ब्राह्मणी। तिहारी अनुहार=तुम्हारे समान रूप वाली। बिपदा-सताई=दुःख की मारी। पामरी=अभागिन। व्याख्या—(अभी भी सुदामा को विश्वास न हुआ कि यह स्त्री मेरी पत्नी है और यह महल मेरा अपना घर हे। उन्होंने कहा—) यहीं पर मेरी टूटी-फूटी झोपड़ी थी। उसी में मेरी पत्नी अपने दुःख के दिन व्यतीत करती थी। उस झोपड़ी के स्थान पर ये सोने के महल कैसे आ गये? (या, उसके रहने के सोने के महल कहाँ थे?) तुम्हारा प्रत्येक अंग जड़ाऊ गहनों से सुशोभित है और इतनी सखियाँ तुम्हारे साथ हैं। परन्तु मेरी ब्राह्मणी वह ब्राह्मणी दुबली- पतली और अकेली थी; उसके शरीर पर कोई गहना न था। तुम ज़री के काम की साड़ी और किनारेदार रेशमी दुपट्टा पहने हुए हो, परन्तु मेरी ब्राह्मणी के पास तो ओढ़ने के लिए सिर्फ़ एक काली कामरिया थी। (हाँ,) तुम्हारी ओर देख कर मैं इतना तो कह सकता हूँ कि मेरी वह ब्राह्मणी तुम्हारी ही सूरत- शक्ल की थी। पर यह बात मेरी समझ में नहीं आती कि जन्म भर दुःख सहने वाली बेचारी ब्राह्मणी को कुछ दिनों के अन्दर ही इतना धन-ऐश्वर्य कहाँ से मिल गया? (अन्तिम पंक्ति का अर्थ, कुछ लोग इस प्रकार लगाते हैं—अपनी विपदा की सतायी हुई दुखिया ब्राह्मणी को मैं कहाँ पाऊँगा?)