सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६० / सुदामा-चरित विशेष—इस कवित्त में सुदामा की हैरानी, दुविधा आदि का अत्यन्त स्वाभाविक चित्रण हुआ है। अनुप्रास अलंकार का सौष्ठव भी द्रष्टव्य है। (८२) शब्दार्थ—मंजु=सुन्दर। भायन सों=भावों से। तिहारोई= तुम्हारी ही। हरौ=दूर कीजिये। श्रम=थकावट। भूरि=बहुत। दारिद गमायो=दरिद्रता मिटायी। गह्यौ कर हैं=हाथ पकड़ती है। अविनासी= अविनाशी=अमर। पूरन-प्रकाशी=पूर्ण ज्योतिर्मय। बरु=श्रेष्ठ। व्याख्या—सुदामा की पत्नी ने खड़ी होकर बड़ी कोमलता से कहा—हे स्वामी ! मैं आपके चरण छूकर कहती हूं कि यह आपका ही घर है। आप बहुत दूर से आये हैं, द्वारिका जाने में आपने बड़ा भारी कष्ट उठाया हैं। श्री- कृष्ण की कृपा से हमारी दरिद्रता दूर हो गयी है। आइये, मैं अपनी सेवा से आपकी थकावट दूर कर दूं। (सुदामा को इस प्रकार समझाते हुए स्त्री ने उनका हाथ पकड़ लिया। सुदामा को अपनी बातों पर पूरा विश्वास न करते देख वह उन्हें फिर समझाती है—) हे नाथ ! सोलहों कलाओं से पूर्ण श्रीकृष्ण, जिनका कभी नाश नहीं होता (जो ईश्वर के अवतार हैं) उन्होंने ही (मित्रता निभाने के लिए) ऋद्धि-सिद्धियों को आपकी दासी बना दिया है, करोड़ों काम- धेनु के साथ अपार सम्पत्ति और सब इच्छाओं को पूरा करने वाला कल्पवृक्ष भी उन्होंने आपको दिया है। आप घर चलिए, भ्रम को त्यागिये और भगवान् ने जो कुछ दिया है उसे ग्रहण कीजिए। विशेष—इस कवित्त में सुदामा-पत्नी अपने अपार वैभव का रहस्य प्रकट करते हुए श्रीकृष्ण के अलौकिक रूप की ओर अपने पति का ध्यान आकृष्ट करती है। (८३) शब्दार्थ —मुदित = प्रसन्न। अन्हवायो=स्नान करवाया। उबटि= उबटन लगा कर। सुचि=शुचि - पवित्र। व्याख्या—इस तरह पति को समझा-बुझा कर ब्राह्मणी उन्हें महल में ले गयी और शीघ्र ही उसने उनके शरीर में पवित्र और सुगंधित उबटन मल-मल कर उन्हें स्नान कराया। (८४) शब्दार्थ— अंबर = वस्त्र। अंबर रचे = वस्त्र पहनाये।