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सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

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६२ / सुदामा-चरित अमृत (या अमृत-तुल्य जल) पिलाया। इसके बाद उसने बड़ी नम्रता से मीठे वचन कहे—अब मेरी सारी इच्छाएँ पूर्ण हो गयीं। (६०) शब्दार्थ—लै=ले कर। आयसु=आज्ञा। तिय=स्त्री। न्हाइ करि =स्नान करके। गौरि=गौरी—पार्वती। सोहाग-हित=सुहाग अचल रखने के लिए। हित=हेतु; लिए। व्याख्या—पति की आज्ञा ले कर सुदामा-पत्नी ने स्नान किया और पवित्र सुगंध शरीर में लगा कर उसने बड़े प्रेम से अपने सौभाग्य की रक्षा के लिए पार्वती की पूजा की। (६१) शब्दार्थ—षटरस=मिष्ट, लवण, कटु, कषाय, अम्ल और तिक्त। रचाय=सजा कर। व्याख्या—सुदामा की पत्नी ने छहों रसों से युक्त चारों प्रकार के भोजन बनाये और सोने की थाली में उन्हें सजा कर रखा। (६२) शब्दार्थ—डारि कै=बिछा कर। सुजानि=चतुर। भाजन-कनक =सोने का पात्र। आनि=ला कर। व्याख्या—चतुर दासी ने भोजन तैयार देख कर चंदन की चौकी बिछायी और रत्नों से जड़े हुए सोने के एक पात्र में गंगाजल भर कर रख दिया। (६३) शब्दार्थ—कूजा=जल रखने का छोटा पात्र; लुटिया। रच्छाधान =ढक्कन। जल-प्रकाश=स्वच्छ जल। भर-पूरि=भर कर। व्याख्या—(फिर) दासी ने ढक्कन सहित (रत्नों से जड़ा हुआ) जलपात्र ला कर रखा, जिसमें पवित्र, सुगंधित एवं स्वच्छ जल पूरा भरा हुआ था। (६४) शब्दार्थ—काम=लिए। मरकत मनि=नीलम। छविधाम - बहुत सुन्दर। व्याख्या—(फिर उसने) सुदामाजी के बैठने के लिए रत्न-जड़ित सोने का पीढ़ा रखा और कुछ दूर पर मणियों से जड़ी हुई बहुत सुन्दर चौकी रखी। (६५) शब्दार्थ—पाथ = पानी; जल। पादुका = खड़ाऊँ। सलिल = जल। व्याख्या—सुदामाजी के पैर धोने के लिए चौकी मँगा कर रखी गयी तथा जल के साथ, उनके पहनने को मणियों से जड़ी हुई खड़ाऊँ रखी गयी।