सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुदामा-चरित / ६३ (६६) शब्दार्थ—मृदु भाखि = मीठे शब्दों में; मधुर शब्द वाली । साखि = साक्षी । कृष्ण को साक्षी करके सुदामाजी ने धन्य-धन्य कहा । व्याख्या—दासी ने आ कर बड़े मीठे शब्दों में कहा—भोजन करने चलिये । (इस समय सुदामा के मन में यह विचार आया कि यह सब धन-ऐश्वर्य श्रीकृष्ण की कृपा का ही फल है ।) अतः, यह कह कर कि 'हे श्रीकृष्ण ! आप धन्य हैं' वे भोजन करने के लिए उठे । (६७) शब्दार्थ—वसन = वस्त्र; कपड़े । सरोज = कमल । जनु = मानो । तनु धरे = शरीर धारण किये । मनोज = कामदेव । व्याख्या—वस्त्र उतार कर चरण-कमल धोने के लिए सुदामाजी जब चौकी पर गये, उस समय वे ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो साक्षात् कामदेव शरीर धारण कर उपस्थित हो गये हों । विशेष—इस दोहे में धन-ऐश्वर्य से सम्पन्न सुदामा के सौन्दर्य का चित्रण हुआ है । रूपक एवं उत्प्रेक्षा अलंकार का स्वाभाविक प्रयोग भी द्रष्टव्य है । (६८) शब्दार्थ—रति = कामदेव की स्त्री । छवि आगरी = सुन्दरता की खान । व्याख्या— (पैर धो कर) सुदामाजी खड़ाऊँ पहन कर भोजन करने के लिए गये और पीढ़े पर जा बैठे । उस समय रति से भी अधिक सुन्दर उनकी स्त्री उनके पास आ मुस्करा कर हँसने लगी । विशेष—इस दोहे में अपार धन-वैभव मिल जाने के उपरांत, सुदामा-पत्नी के सौन्दर्य का चित्रण हुआ है । व्यतिरेक अलंकार के प्रयोग द्वारा कवि ने उसे कामदेव की पत्नी से भी अधिक सुन्दर बताया है । (६६) शब्दार्थ—व्यंजन चारि प्रकार = चार प्रकार के भोजन—चर्व्य, चूच्य, लेह्य और पेय । जोरी = एकत्र की । पछिऔरी = भोजन के बाद दिया जाने वाला पेय; शिखरन आदि । व्याख्या—अनेक प्रकार के भोजन, चारों प्रकार के व्यंजन और अंत में खायी जाने वाली पछिऔरी सुदामाजी के सामने रखी गयी । कवि कहता है कि उनके भोजन का वर्णन नहीं किया जा सकता है ।