सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुदामा-चरित / ६६ डुलाने के लिए बहुत से दास और रत्नों से भरे भंडार, मुझे स्वप्न में भी नहीं प्राप्त होते। यदि तेरे उपदेशों को न मान कर मैं द्वारिका न जाता तो श्रीकृष्ण मुझ पर इतनी कृपा नहीं करते। विशेष—इस कवित्त में सुदामा अपनी पत्नी सुबुद्धि के प्रति आभार प्रकट करते हैं, उसी की सद्प्रेरणा से वे मित्र-वत्सल श्रीकृष्ण के पास द्वारिकापुरी जाते हैं और उन्हें अपार धन-सम्पत्ति प्राप्त होती है। अनुप्रास अलंकार की छटा इस छन्द में भी यत्र-तत्र देखी जा सकती है। (११६) शब्दार्थ — अम्बर = वस्त्र । प्रभुता = ऐश्वर्य । सुरपति = इन्द्र । व्याख्या — (विश्राम करने के बाद) सुदामाजी सुन्दर वस्त्रों को धारण कर सिंहासन पर आ कर बैठे । उस समय उनकी प्रभुता देख कर इन्द्र भी लज्जित हो गये । (१२०) शब्दार्थ — कै = या; अथवा । हति = थी । छानी = झोपड़ी । पनही = जूते । जुरतो = जुटता था । परताप = प्रताप । दाख = द्राक्षा; अंगूर । व्याख्या—(कवि सुदामाजी की विगत एवं वर्त्तमान दशा की तुलना करते हुए कहता है—) द्वारिका जाने के पूर्व उनकी टूटी-फूटी झोपड़ी थी, आज उनके सोने के महल हैं। पहले (निर्धन और साधनहीन होने के कारण) कहाँ वे नंगे पैर रहते थे, आज उनकी सवारी के लिए गजराज सजे हुए हैं। पहले कहाँ कठोर पृथ्वी पर बिना बिछावन के ही वे रात काट लेते थे, आज कोमल सेज पर भी उन्हें नींद नहीं आती। पहले कहाँ उन्हें कोदों-साँवाँ-जैसे मोटे अनाज भी भर पेट नहीं मिलते थे, आज भगवान् की कृपा से उन्हें इतना धन मिल गया कि दाख-जैसे मेवे भी (उन्हें) अच्छे नहीं लगते । विशेष—इस सवैया छन्द में सुदामा के गत दारिद्र्य और दीन दयाल श्री- कृष्ण की अपार कृपा से प्राप्त धन-वैभव का मार्मिक वर्णन हुआ है। कवि का भाषा पर असाधारण अधिकार है, इसीसे वह अत्यन्त उपयुक्त तथा सार्थक शब्दों के चयन तथा उनके प्रयोग की दक्षता प्रकट करता है। अनुप्रास अलंकार का स्वाभाविक प्रयोग भी उसके वर्णन को प्रभावशाली बनाता है ।