सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८ / सुदामा-चरित चयन सराहनीय है । (११७) शब्दार्थ—वाजिसाला = अश्वशाला, घुड़साल । गजसाला = गज- शाला—हथसार । गजराज = ऐरावत । ब्रजराज = श्रीकृष्ण । बानक = शृंगार । झरोखन मैं = खिड़कियों में । झिम-झिम = धीरे-धीरे । झूमक = एक प्रकार का आभूषण जिसे स्त्रियां कानों में पहनती हैं । मुकतान—मोतियां । बिधान— व्यवस्था । व्याख्या—कवि कहता है कि श्रीकृष्ण के दान का ढंग विचित्र है । (देखिये न !) श्रीकृष्ण से भेंट होने पर सुदामा का दुःख-दारिद्र्य न जाने किधर चला गया । (कहने का तात्पर्य यह है कि श्रीकृष्ण से भेंट होते ही सुदामा का दुःख- दारिद्र्य दूर हो गया ।) (अब तो) श्रीकृष्ण के समान ही सुदामा के पास भी हथसार और घुड़साल हैं । उनकी सवारी के लिए हर समय गजराज (ऐरावत) तैयार रहते हैं। उनके सोने के महल बहुत कलापूर्ण रीति से बने हैं, उनमें मणियां जड़ी हैं और उनके झरोखों में हीरे और लालों के साथ-साथ मोतियों की झालरें झूम रही हैं। इन सबको देख कर देवताओं के मन भी मुग्ध हो जाते हैं । विशेष—इस कवित्त में भी मित्र-वत्सल श्रीकृष्ण की अपार कृपा से मिले सुदामा के धन-वैभव का वर्णन हुआ है । कवि वर्णनात्मक शैली में उस भव्य वैभव का निरूपण करता है । उसी के अनुरूप शब्द-सम्पदा अनुप्रास आदि शब्दा- लंकारों का प्रयोग करता है । (११८) शब्दार्थ—सुवरन = सुवर्ण—सोना । पौरि = द्वार; फाटक । मनि- मंडप = मणियों से बने मंडप । वर = सुन्दर । खवास = सेवक; खानसामा । मो = मुझ । चौर ढरते = चँवर डुलाते । पै = पर । राज-सामा = राज-समाज; राज-वैभव । एती = इतनी । व्याख्या—सुदामा अपनी पत्नी से कहते हैं—हे पतिव्रता ! यदि तुम्हारे उपदेशों को न मान कर मैं द्वारका न जाता तो ये सोने के बड़े-बड़े महल, द्वारों पर रखे हुए मणियों से जड़े कलश, बैठने के लिए रत्नजटित सिंहासन, चँवर