सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुदामा-चरित / ६७ (सत्य), चित् (चैतन्य) और आनन्द कहा गया है क्योंकि वे परम सत्य, परम चेतन और परम आनन्द हैं। व्याख्या—इस प्रकार पूरी कथा कह जाने के बाद सुदामा ने अपने उस भ्रम की भी बात कही (जो उन्हें कृष्ण के; प्रत्यक्ष रूप से विदाई के अवसर पर कुछ न देने से, द्वारिका से लौटते समय हो गया था और जिस भ्रम के कारण उन्होंने श्रीकृष्ण को एक छोटा-सा निरापद शाप भी दे डाला था।) पर आज उन्होंने स्वीकार किया कि श्रीकृष्ण भक्तों के हितकारी हैं और चैतन्य तथा आनन्द के भंडार हैं। (११६) शब्दार्थ—साजवाज = साज-सामान; सजावट । बाजि = घोड़ा । गज = हाथी । राजत = शोभा दे रहा है। बहल = बहली; सुन्दर छायादार बैलगाड़ी । शुभ-सिंहासन = मंगलमय सिंहासन । चौक प्रति = प्रति चौक में; प्रति आंगन में । लहलहैं = लहलहा रहे हैं; हरे-भरे हो रहे हैं; झूम रहे हैं। पाकसासन = इन्द्र । सहल = साधारण; तुच्छ । लागत सहल हैं = तुच्छ लगते हैं । लौं = तक । व्याख्या—कवि कहता है कि श्रीकृष्ण ने सुदामाजी को जो सम्पत्ति दी उसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। अब सुदामाजी के पास सब तरह से सजे हुए हाथी, घोड़े, रथ, पालकी और छायादार बैलगाड़ियां हैं। बैठने के लिए रत्नजटित सुन्दर सिंहासन है। प्रत्येक महल के आँगन में कामधेनु और कल्पतरु हैं। उनके सारे महल सोने के बने हैं ! (और कहाँ तक कहा जाय) सुदामाजी के दास-दासियों के आभूषण एवं वस्त्रों को देख कर देवराज इन्द्र के ऐश्वर्य भी तुच्छ लगते हैं। विशेष—इस कवित्त में वर्णनात्मक शैली का सौष्ठव विशेष रूप से द्रष्टव्य है । कवि दीन दयालु श्रीकृष्ण द्वारा प्राप्त सुदामा के अपार धन-ऐश्वर्य का वर्णन करने में पर्याप्त सफल रहा है। उसने अपने वर्णन को प्रभावोत्पादक बनाने के लिए अनुप्रास अलंकार का अत्यन्त सार्थक प्रयोग किया है। उसका शब्द-