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सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

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६६ / सुदामा-चरित व्याख्या—(सुदामा ने आगे कहा—) श्रीकृष्ण हाथ पकड़ कर मुझे अन्तः- पुर में ले गये और स्वयं ही मेरे पैर धोने लगे। (१११) शब्दार्थ—नयनन तें=आँखों से। वारि चल्यो=आँसू बहने लगे। व्याख्या—(सुदामा ने कहा—) श्रीकृष्ण ने जब धोने के लिए मेरे पैर उठाये तो मेरे पैरों की दशा देख कर उनकी आँखों से जो जलधारा बही उसी से मेरे पैर धुल गये। यह दृश्य देख कर वहाँ उपस्थित सभी नर-नारी चकित हो गये। (११२) शब्दार्थ—बहुरि=फिर। मेटे=दूर किया। भ्रम=सन्देह, संकोच। सन्ताप=दुःख। व्याख्या—इसके बाद सुदामा ने वे बातें कहीं कि भगवान् श्रीकृष्ण ने किस प्रकार स्वयं चावल लेकर खाये और किस प्रकार उन्हें अपने गले से लगा कर उनके सारे सन्देहों (संकोचों) और दुःखों को दूर कर दिया। (११३) शब्दार्थ—जेवनार=भोजन की व्यवस्था। पांति=कतार। व्याख्या—तब सुदामा ने श्रीकृष्ण के यहाँ के जेवनार का वर्णन करते हुए कहा, जो-जो व्यंजन मैंने वहाँ खाये उन सबका वर्णन मैं कहाँ तक करूँ; अर्थात् उन सबका वर्णन करने में मैं असमर्थ हूँ। (११४) शब्दार्थ—सपन=स्वप्न। परतच्छ=प्रत्यक्ष। निसफल= बेकार। व्याख्या—(फिर उन्होंने कहा—) जितने दिन मैं वहाँ रहा, श्रीकृष्ण ने मुझे नित्यप्रति अत्यन्त प्रेम से रख कर धन और वैभव का स्वप्न दिखलाया। मैं उस स्वप्न को यहाँ प्रत्यक्ष देख रहा हूँ अर्थात् मेरे स्वप्न सत्य हो गये। अब मुझे विश्वास हो गया कि सपने झूठे नहीं होते। (११५) शब्दार्थ—कह्यो आयनो मोह=सब कथा कहने के बाद सुदामा ने अपने उस भ्रम की बात कही जो उन्हें कृष्ण के, प्रत्यक्ष रूप से विदाई के अवसर पर कुछ न देने से, द्वारिका से लौटते समय हो गया था। कृपानिधि=दयासागर। भगत-हित=भक्त-हितकारी। चिदानन्द=चित्—आनन्द। भगवान् को सत्