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सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

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सुदामा-चरित / ६५ व्याख्या—(उन्होंने) पलंग के पास ही पान बीड़ों से भरा हुआ सुन्दर पानदान रख दिया। तब सुदामाजी पैर धो कर विश्राम करने के लिए लेट गये। (१०६) शब्दार्थ—बीजना = पंखा। सेवत पद चारु = कोई सुन्दर पाँवों को दबाता। गजमोतिन = गजमुक्ता। हारु = हार; माला। व्याख्या—कोई दासी चँवर डुलाने लगी, कोई पंखा झलने लगी। सेवक उनके चरण दबाने लगे। सब दास-दासियाँ सुन्दर आभूषणों से सजे हुए थे और गजमुक्ताओं के हार पहने हुए थे। (१०७) शब्दार्थ—पिय = पति। पै = पास। किमि = किस प्रकार। एहि भाँति = इस रूप में। व्याख्या—(सुदामा को विश्राम करते हुए देख कर) उनकी पत्नी श्रृंगार करके, पान खा कर मुस्कुराती हुई उनके पास आयी और उसने पूछा – अब मुझे आरम्भ से वह कथा सुनाइये कि किस प्रकार श्रीकृष्ण ने हमको इतनी सम्पत्ति दी। (१०८) शब्दार्थ—आदिते = शुरू से। जिमि = जैसे। व्याख्या—सुदामा ने शुरू से सब कथा सुनाना आरम्भ किया। उन्होंने बत- लाया कि इस तरह रास्ता चलते-चलते उनके पैर थक गये और वो सो गये। फिर बतलाया कि किस तरह सोयी हुई दशा में ही श्रीकृष्ण ने उन्हें गोमती के किनारे पहुँचा दिया। (१०६) शब्दार्थ—बखान = वर्णन; बड़ाई करते हुए वर्णन करना। मुख लाख सों = लाख मुख से भी। आन = आ कर। व्याख्या—जिस प्रकार श्रीकृष्ण के द्वार पर वे पहुँचे, उस कथा का भी उन्होंने वर्णन किया। और, तब कहा कि श्रीकृष्ण जिस प्रकार आकर उद्वेग और उमंग से उनसे मिले उसका वर्णन एक मुँह से क्या लाखों मुँहों से भी नहीं किया जा सकता है। (११०) शब्दार्थ—रमा-निवास = श्रीकृष्ण ; जिनके हृदय में लक्ष्मी का निवास है।