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सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

सुदामा-चरित / ६५ व्याख्या—(उन्होंने) पलंग के पास ही पान बीड़ों से भरा हुआ सुन्दर पानदान रख दिया। तब सुदामाजी पैर धो कर विश्राम करने के लिए लेट गये। (१०६) शब्दार्थ—बीजना = पंखा। सेवत पद चारु = कोई सुन्दर पाँवों को दबाता। गजमोतिन = गजमुक्ता। हारु = हार; माला। व्याख्या—कोई दासी चँवर डुलाने लगी, कोई पंखा झलने लगी। सेवक उनके चरण दबाने लगे। सब दास-दासियाँ सुन्दर आभूषणों से सजे हुए थे और गजमुक्ताओं के हार पहने हुए थे। (१०७) शब्दार्थ—पिय = पति। पै = पास। किमि = किस प्रकार। एहि भाँति = इस रूप में। व्याख्या—(सुदामा को विश्राम करते हुए देख कर) उनकी पत्नी श्रृंगार करके, पान खा कर मुस्कुराती हुई उनके पास आयी और उसने पूछा – अब मुझे आरम्भ से वह कथा सुनाइये कि किस प्रकार श्रीकृष्ण ने हमको इतनी सम्पत्ति दी। (१०८) शब्दार्थ—आदिते = शुरू से। जिमि = जैसे। व्याख्या—सुदामा ने शुरू से सब कथा सुनाना आरम्भ किया। उन्होंने बत- लाया कि इस तरह रास्ता चलते-चलते उनके पैर थक गये और वो सो गये। फिर बतलाया कि किस तरह सोयी हुई दशा में ही श्रीकृष्ण ने उन्हें गोमती के किनारे पहुँचा दिया। (१०६) शब्दार्थ—बखान = वर्णन; बड़ाई करते हुए वर्णन करना। मुख लाख सों = लाख मुख से भी। आन = आ कर। व्याख्या—जिस प्रकार श्रीकृष्ण के द्वार पर वे पहुँचे, उस कथा का भी उन्होंने वर्णन किया। और, तब कहा कि श्रीकृष्ण जिस प्रकार आकर उद्वेग और उमंग से उनसे मिले उसका वर्णन एक मुँह से क्या लाखों मुँहों से भी नहीं किया जा सकता है। (११०) शब्दार्थ—रमा-निवास = श्रीकृष्ण ; जिनके हृदय में लक्ष्मी का निवास है।

६६ / सुदामा-चरित व्याख्या—(सुदामा ने आगे कहा—) श्रीकृष्ण हाथ पकड़ कर मुझे अन्तः- पुर में ले गये और स्वयं ही मेरे पैर धोने लगे। (१११) शब्दार्थ—नयनन तें=आँखों से। वारि चल्यो=आँसू बहने लगे। व्याख्या—(सुदामा ने कहा—) श्रीकृष्ण ने जब धोने के लिए मेरे पैर उठाये तो मेरे पैरों की दशा देख कर उनकी आँखों से जो जलधारा बही उसी से मेरे पैर धुल गये। यह दृश्य देख कर वहाँ उपस्थित सभी नर-नारी चकित हो गये। (११२) शब्दार्थ—बहुरि=फिर। मेटे=दूर किया। भ्रम=सन्देह, संकोच। सन्ताप=दुःख। व्याख्या—इसके बाद सुदामा ने वे बातें कहीं कि भगवान् श्रीकृष्ण ने किस प्रकार स्वयं चावल लेकर खाये और किस प्रकार उन्हें अपने गले से लगा कर उनके सारे सन्देहों (संकोचों) और दुःखों को दूर कर दिया। (११३) शब्दार्थ—जेवनार=भोजन की व्यवस्था। पांति=कतार। व्याख्या—तब सुदामा ने श्रीकृष्ण के यहाँ के जेवनार का वर्णन करते हुए कहा, जो-जो व्यंजन मैंने वहाँ खाये उन सबका वर्णन मैं कहाँ तक करूँ; अर्थात् उन सबका वर्णन करने में मैं असमर्थ हूँ। (११४) शब्दार्थ—सपन=स्वप्न। परतच्छ=प्रत्यक्ष। निसफल= बेकार। व्याख्या—(फिर उन्होंने कहा—) जितने दिन मैं वहाँ रहा, श्रीकृष्ण ने मुझे नित्यप्रति अत्यन्त प्रेम से रख कर धन और वैभव का स्वप्न दिखलाया। मैं उस स्वप्न को यहाँ प्रत्यक्ष देख रहा हूँ अर्थात् मेरे स्वप्न सत्य हो गये। अब मुझे विश्वास हो गया कि सपने झूठे नहीं होते। (११५) शब्दार्थ—कह्यो आयनो मोह=सब कथा कहने के बाद सुदामा ने अपने उस भ्रम की बात कही जो उन्हें कृष्ण के, प्रत्यक्ष रूप से विदाई के अवसर पर कुछ न देने से, द्वारिका से लौटते समय हो गया था। कृपानिधि=दयासागर। भगत-हित=भक्त-हितकारी। चिदानन्द=चित्—आनन्द। भगवान् को सत्

सुदामा-चरित / ६७ (सत्य), चित् (चैतन्य) और आनन्द कहा गया है क्योंकि वे परम सत्य, परम चेतन और परम आनन्द हैं। व्याख्या—इस प्रकार पूरी कथा कह जाने के बाद सुदामा ने अपने उस भ्रम की भी बात कही (जो उन्हें कृष्ण के; प्रत्यक्ष रूप से विदाई के अवसर पर कुछ न देने से, द्वारिका से लौटते समय हो गया था और जिस भ्रम के कारण उन्होंने श्रीकृष्ण को एक छोटा-सा निरापद शाप भी दे डाला था।) पर आज उन्होंने स्वीकार किया कि श्रीकृष्ण भक्तों के हितकारी हैं और चैतन्य तथा आनन्द के भंडार हैं। (११६) शब्दार्थ—साजवाज = साज-सामान; सजावट । बाजि = घोड़ा । गज = हाथी । राजत = शोभा दे रहा है। बहल = बहली; सुन्दर छायादार बैलगाड़ी । शुभ-सिंहासन = मंगलमय सिंहासन । चौक प्रति = प्रति चौक में; प्रति आंगन में । लहलहैं = लहलहा रहे हैं; हरे-भरे हो रहे हैं; झूम रहे हैं। पाकसासन = इन्द्र । सहल = साधारण; तुच्छ । लागत सहल हैं = तुच्छ लगते हैं । लौं = तक । व्याख्या—कवि कहता है कि श्रीकृष्ण ने सुदामाजी को जो सम्पत्ति दी उसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। अब सुदामाजी के पास सब तरह से सजे हुए हाथी, घोड़े, रथ, पालकी और छायादार बैलगाड़ियां हैं। बैठने के लिए रत्नजटित सुन्दर सिंहासन है। प्रत्येक महल के आँगन में कामधेनु और कल्पतरु हैं। उनके सारे महल सोने के बने हैं ! (और कहाँ तक कहा जाय) सुदामाजी के दास-दासियों के आभूषण एवं वस्त्रों को देख कर देवराज इन्द्र के ऐश्वर्य भी तुच्छ लगते हैं। विशेष—इस कवित्त में वर्णनात्मक शैली का सौष्ठव विशेष रूप से द्रष्टव्य है । कवि दीन दयालु श्रीकृष्ण द्वारा प्राप्त सुदामा के अपार धन-ऐश्वर्य का वर्णन करने में पर्याप्त सफल रहा है। उसने अपने वर्णन को प्रभावोत्पादक बनाने के लिए अनुप्रास अलंकार का अत्यन्त सार्थक प्रयोग किया है। उसका शब्द-

६८ / सुदामा-चरित चयन सराहनीय है । (११७) शब्दार्थ—वाजिसाला = अश्वशाला, घुड़साल । गजसाला = गज- शाला—हथसार । गजराज = ऐरावत । ब्रजराज = श्रीकृष्ण । बानक = शृंगार । झरोखन मैं = खिड़कियों में । झिम-झिम = धीरे-धीरे । झूमक = एक प्रकार का आभूषण जिसे स्त्रियां कानों में पहनती हैं । मुकतान—मोतियां । बिधान— व्यवस्था । व्याख्या—कवि कहता है कि श्रीकृष्ण के दान का ढंग विचित्र है । (देखिये न !) श्रीकृष्ण से भेंट होने पर सुदामा का दुःख-दारिद्र्य न जाने किधर चला गया । (कहने का तात्पर्य यह है कि श्रीकृष्ण से भेंट होते ही सुदामा का दुःख- दारिद्र्य दूर हो गया ।) (अब तो) श्रीकृष्ण के समान ही सुदामा के पास भी हथसार और घुड़साल हैं । उनकी सवारी के लिए हर समय गजराज (ऐरावत) तैयार रहते हैं। उनके सोने के महल बहुत कलापूर्ण रीति से बने हैं, उनमें मणियां जड़ी हैं और उनके झरोखों में हीरे और लालों के साथ-साथ मोतियों की झालरें झूम रही हैं। इन सबको देख कर देवताओं के मन भी मुग्ध हो जाते हैं । विशेष—इस कवित्त में भी मित्र-वत्सल श्रीकृष्ण की अपार कृपा से मिले सुदामा के धन-वैभव का वर्णन हुआ है । कवि वर्णनात्मक शैली में उस भव्य वैभव का निरूपण करता है । उसी के अनुरूप शब्द-सम्पदा अनुप्रास आदि शब्दा- लंकारों का प्रयोग करता है । (११८) शब्दार्थ—सुवरन = सुवर्ण—सोना । पौरि = द्वार; फाटक । मनि- मंडप = मणियों से बने मंडप । वर = सुन्दर । खवास = सेवक; खानसामा । मो = मुझ । चौर ढरते = चँवर डुलाते । पै = पर । राज-सामा = राज-समाज; राज-वैभव । एती = इतनी । व्याख्या—सुदामा अपनी पत्नी से कहते हैं—हे पतिव्रता ! यदि तुम्हारे उपदेशों को न मान कर मैं द्वारका न जाता तो ये सोने के बड़े-बड़े महल, द्वारों पर रखे हुए मणियों से जड़े कलश, बैठने के लिए रत्नजटित सिंहासन, चँवर

सुदामा-चरित / ६६ डुलाने के लिए बहुत से दास और रत्नों से भरे भंडार, मुझे स्वप्न में भी नहीं प्राप्त होते। यदि तेरे उपदेशों को न मान कर मैं द्वारिका न जाता तो श्रीकृष्ण मुझ पर इतनी कृपा नहीं करते। विशेष—इस कवित्त में सुदामा अपनी पत्नी सुबुद्धि के प्रति आभार प्रकट करते हैं, उसी की सद्प्रेरणा से वे मित्र-वत्सल श्रीकृष्ण के पास द्वारिकापुरी जाते हैं और उन्हें अपार धन-सम्पत्ति प्राप्त होती है। अनुप्रास अलंकार की छटा इस छन्द में भी यत्र-तत्र देखी जा सकती है। (११६) शब्दार्थ — अम्बर = वस्त्र । प्रभुता = ऐश्वर्य । सुरपति = इन्द्र । व्याख्या — (विश्राम करने के बाद) सुदामाजी सुन्दर वस्त्रों को धारण कर सिंहासन पर आ कर बैठे । उस समय उनकी प्रभुता देख कर इन्द्र भी लज्जित हो गये । (१२०) शब्दार्थ — कै = या; अथवा । हति = थी । छानी = झोपड़ी । पनही = जूते । जुरतो = जुटता था । परताप = प्रताप । दाख = द्राक्षा; अंगूर । व्याख्या—(कवि सुदामाजी की विगत एवं वर्त्तमान दशा की तुलना करते हुए कहता है—) द्वारिका जाने के पूर्व उनकी टूटी-फूटी झोपड़ी थी, आज उनके सोने के महल हैं। पहले (निर्धन और साधनहीन होने के कारण) कहाँ वे नंगे पैर रहते थे, आज उनकी सवारी के लिए गजराज सजे हुए हैं। पहले कहाँ कठोर पृथ्वी पर बिना बिछावन के ही वे रात काट लेते थे, आज कोमल सेज पर भी उन्हें नींद नहीं आती। पहले कहाँ उन्हें कोदों-साँवाँ-जैसे मोटे अनाज भी भर पेट नहीं मिलते थे, आज भगवान् की कृपा से उन्हें इतना धन मिल गया कि दाख-जैसे मेवे भी (उन्हें) अच्छे नहीं लगते । विशेष—इस सवैया छन्द में सुदामा के गत दारिद्र्य और दीन दयाल श्री- कृष्ण की अपार कृपा से प्राप्त धन-वैभव का मार्मिक वर्णन हुआ है। कवि का भाषा पर असाधारण अधिकार है, इसीसे वह अत्यन्त उपयुक्त तथा सार्थक शब्दों के चयन तथा उनके प्रयोग की दक्षता प्रकट करता है। अनुप्रास अलंकार का स्वाभाविक प्रयोग भी उसके वर्णन को प्रभावशाली बनाता है ।

१०० / सुदामा-चरित (१२१) शब्दार्थ—जदुबंस-मनि=यदुवंशमणि—श्रीकृष्ण। अनुकूल= प्रसन्न। बरषहिं=बरसते हैं। व्याख्या—सुदामा पर श्रीकृष्ण की दया देखकर देवगण आकाश से फूलों की वर्षा करते हैं और कहते हैं—दरिद्रों पर दया करने वाले श्रीकृष्ण धन्य हैं; सुदामा अपनी पत्नी-सहित धन्य हैं। □□□

परिशिष्ट पाठ-भेद ‘सुदामा-चरित’ की कुछ प्रतियों में निम्नलिखित छन्द भी मिलते हैं : मंगलाचरण छन्द १, २, ३ के स्थान पर निम्नलिखित प्रथम दो छन्द मिलते हैं : गनपति कृपानिधान, विद्या, वेद, विवेक जुत । देहु मोहिं बरदान हर्ष सहित हरिगुन कहौं ॥१॥ हरि चरित्र बहु भाई सेस दिनेस न कहि सकैं । प्रेम सहित चित लाइ सुनौ सुदामा की कथा ॥२॥ सुदामा चंद को मित्र चकोर सदा तेइ भोजन आग विरंचि ने दीनी । पंकज कौ हितु द्यौसपती हिम जारत ताहि यहै प्रन लीनो ॥ कर्मबली सुनु री अबला ! नित संग रहै सबकै पुर तीनो । लच्छिमी-नाथ सखा जिनके तिनके घर बास दरिद्र ने कीनो ॥३॥ दोहा मान-बड़ाई प्रेम-रस गरु आपन औ नेहु । ये पांचौ तबही गये जबै कही कछु देहु ॥४॥

१०२ / सुदामा-चरित कवित्त स्याम सों मिताई मैं तो जब ते जताई यासों, तबहीं ते मेरे पाछे कढ़िवे को परी है। याके हँसि बोले हौं न जानत हौं और दुख, कालिका - निकाई राम ! वहै क्रोध भरी है। सेवा छांड़ि दई आगे लठिया लै ठाड़ी भई, हरि पै चलाइबे की कथा कंठ करी है। बठत, उठत, न्हात, खात, सोए आधी रात, ऐसी सावधान ज्यों घरावत की धरी है ॥५॥ दाम ही सों मान औ बड़ाई जस दाम ही सों, दाम ही सों दैवो लैवो दाम ही सों काम है। दाम ही सों तिथिव्रत नेमधर्म दाम ही सों, दाम ही सों देवपूजा दाम ही सों नाम है। दाम ही सों जग में फिरत कवि पंडित हू, जापै नहिं दाम ताको सूखि जात चाम है। राजा और राव बादसाहन को कौन गिने, मेरे जान बीस बिसें दाम ही में राम है ॥६॥ पिता निज पुत्र त्यागै भाई नहिं साथ लागै, नारी मुख देखि भागै पूछत न बात है। चाचा हू चवाव करै मां बहन नित्य लरै, भोजन रिसाय धरै कूकर ज्यौं खात है। लोग कहैं कूर भए भाई सब दूर भए, वृथा जग जन्म जात पाछे पछतात है। सास औ ससुर दैयो लेत न बलैया मैया, आज के जमाने में रुपैया करामात है ॥७॥

सुदामा-चरित / १०३ दोहा मान बड़ाई प्रेमरस गरु आपन अरु नेहु । ये पांचौ तबही गए जबहि कही कछु देहु ॥८॥ कवित्त चल्यौ है सुदामा कहै बात घर रामजी सों, मांगिहौं न दाम तासों सांची ही कहत हौं । जो पै मोहिं आपहिं ते बूझिहैं बैकुंठनाथ, तब हों कहांगो प्रभु खुसी ही रहत हौं । अबहूँ विचारि दुखे सुखे दिन टारि कित, पठवै मुरारि जो पै आपदा लहत हौं । विना दाम धाम फिरि ऐहौं भेंटि स्यामजी सों, तेरे कहें राम की सो लठिया गहत हौं ॥६॥ दोहा मो मरने को नेम है मरूँ तो हरि के द्वार । कबहूं तों हरि पूछिहैं कौन मरो दरबार ॥१०॥ कवित्त काँपै सुरपति नरपति काँपे ठौर-ठौर, आगम जनायो द्विजवंत जिय बामा के । छाँड़ि दई आस कइलासहू की महा ईस, सोच ब्रह्मादिकहू सकल सुखधामा के । डरपे कुबेर डगमगत सुमेर भए, जानि डर कर्यो राम गुनकर नामा के । एते हहराने घहराने हरि हितू जानि, द्वारिका की ओर पग धरत सुदामा के ॥११॥

१०४ / सुदामा-चरित दोहा करि प्रनाम गनपति सुमिरि पहुँचि गए हरि द्वार । देखि भीर सब नृपन की लागे करन विचार ॥१२॥ यह सुनि ड्यौढ़ी पै कह्यो द्वारपाल सकुचात । महाराज द्विज एक को कहत सन्देस लजात ॥१३॥ सुन्यौ सुदामा नाम जब तब सुधि रही न और । उठि दौरे परजंक तें तजि तरुनिन को झौर ॥१४॥ सुन्दर कनक परात में धर्यौ सलिल ज्यों दास । पगधोवन कों आप ही बैठे जगत निवास ॥१५॥ कुसल क्षेम पूछत लगे कहौ सुदामा मित्र । भाभी ने कछु कहि दियौ भाखो परम विचित्र ॥१६॥ तुम तौ चतुर सुजान हौ जानत मो मन चित्त । एक मास में द्वै परै सौ माकों है नित्त ॥१७॥ तब तौ दिन कछु और हे अब आए कछु और । नित होवैगी द्वादसी तुम चित्त राखौ ठौर ॥१८॥ गुरु सेवा दुर्लभ महा चित दै करै जो कोय । जो मन में इच्छा करै सो सब पूरन होय ॥१९॥ पवन झकोरत तीव्र सों सीत भयो अधिकाय । काठभार मस्तक धर्यौ हाकों लियो छिपाय ॥२०॥ बहुत भांति रक्षा करी आप रहे दुख मांहि । तुम्हरी प्रीति अनन्त है उऋन होहुँ मैं नाहिं ॥२१॥

सुदामा-चरित / १०५

सवैया

हाथ गह्यो प्रभु को कमला कहै, नाथ कहा तुमनै चित धारी। सन्दुल खाय मुठी दुई, दीन कियो तुमने दुई लोक-बिहारी॥ खाय मुठी तिसरी अब नाथ कहां निज बास की आस बिचारी। रंकहि आप समान कियो तुम चाहत आपहि होन भिखारी॥२२॥

दोहा

करि आचमन मुख धोय के, पान खाय सुख पाय। पौढ़े पलका पै तबैं कृष्ण पलोटैं पांय॥२३॥ बस्त्रादिक बहु भांति के, पहिराए सुखदाय। करि प्रनाम कर जोरि कै, बोले त्रिभुवन राय॥२४॥

सवैया

धन्य कहा कहिए द्विजजू तुम सों जग कौन उदार प्रवीनो। पिछली प्रीति निबाही भली बिधि दोष निवारिकै रोष न कीनो। हौं द्विज के चरणोदक हेतु अजन्म कहाय कै जन्म सुलीनो। आवन कै निज पावन सो यहां, मोसो अपावन पावन कीनो॥२५॥

दोहा

नित नित सब द्वारावती दिखराई प्रभु आप। भले बाग अनुराग सह जहां न व्यापै ताप॥२६॥ परम कृपा दिन दिन करी कृपानाथ जदुराय। मित्र भावना बिस्तारी दूनो आर भाय॥२७॥ चिंता करि सोवत भयो देख्यौ सपन विनीत। देव सकल आए गहूरि संपत लिए पुनीत॥२८॥ आज्ञा दई गुपाल जू बिसकर्मा तुम जाहु। लाइ बिभौ दुइ लोक को नगर सुदाम बसाहु॥२९॥

१०६ / सुदामा-चरित रैनि मध्य सब लाइकै करि दीजौ इकठौर । हय गयंद रथ पालकी विसकर्मा सिरमौर ॥३०॥ कवित्त कह्यौ विस्वकरमा कों हरि तुम जाय करि, नगर सुदामा जी को रचौ बेगि अवहीं । रतनजटित धाम सुबरनमई सब, कोट औ वजार बाग फूलन के तबहीं । कल्पवृक्ष द्वार गज रथ असवार प्यादे, कीजिये अपार दास दासी देव छविहीं । इंद्र औ कुबेर आदि देववधू अपसरा, गंधरब गुनी जहां ठाढ़े रहें सबहीं ॥३१॥ दोहा दंडवत करि बहु भांति सो आज्ञा श्री जदुआय । विभौ साँज सब लै चले मंदिर रचे बनाइ ॥३२॥ सवैया आए हौ आज कै कालि अबै तुम जाहुगे पर्सों कि नर्सों अबारे । पत्र लिखौं सोइ मित्र हमारे कहां उतरौगे जु जाग तुम्हारे ॥ मैं तौ रहौं दरबार के भीतर आवत हौं कबौं सांझ सबारे । मूरख मित्र की प्रीति सुनौ जहां काग उड़ै सोइ जग्ग हमारे ॥३३॥ दोहा गोपुर लौं पहुँचाय कै, फिरे सकल दरबार । मित्र वियोगी कृष्ण के, नेत्र चली जल धार ॥३४॥ प्रीति आरसी विमल है सब कोउ सेवै जानि । कपट मोरचा लगत ही होत दरस की हानि ॥३५॥

सुदामा-चरित / १०७ रहियो आवत जात इत कहत न लागी लाज। ऐसे आवन जान तें हौं अब आयौ बाज ॥३६॥ इन सोचन सोचत चले हरि को अति दुख मानि। घर की सुधि बँम्हनै नहीं दीन्हीं सुख की खानि ॥३७॥ कवित्त जगर-मगर जोति छाय रही चहुं ओर, अगर-बगर हाथी घोरन कौ सोर है। चौपर को वनो है बजारे पुनि सोरन के, महल दुकान की कतार चहुं ओर है॥ भीर-भार धकापेल चहुं दिसि देखियत, द्वारिका तें दूनों यहाँ प्यादन कौ जोर है॥ रहिबो को ठाम है न, काहु सों पिछान मेरी, बिन जाने बसे कोउ हाड़ मेरे तोरे है ॥३८॥ वेई सुरतरु प्रफुलित फुलवारिन मैं, वेई सरवर हँस बोलन-मिलन कों। वेई हेम-रिन दिसान दहलीजन मैं, वेई गजराज हय गरज पिलन कों। द्वार द्वार छरी लिए द्वारपौँरिया हैं खरे, बोलत मरोर बरजोर त्यों झिलन कों। द्वारिका तें चल्यौ भूलि द्वारिका ही आयौ नाथ, मांगियो न मो पै चारि चाउर गिलन कों ॥३६॥ फूटी एक थारी बिना टोंटनी की झारी हुतीं, बांस की पिटारी औ कथारी हुती टाट की, बेंठे बिन छुरी औ कमंडल सौ टूंक बहौ, फटे ते पाये पाटी टूटी एक खाट की।

१०८ / सुदामा-चरित पथरौटा काठि कौ कठौता कहूं दीसौ नाहिं, पीतर को लौटा हो कटोरा हौ न बाटकी। कामरी फटी सी हुती डोंड़न की माला ताक गोमती की माटी की न सुद्धि कहूं माटकी ॥४०॥ दोहा जित जित बांमन जात है तित तित के नर नारि । पायं गहत हैं बिप्र के बहु पूंछत सुभकारि ॥४१॥ गए हुते द्वारावती मिलिबे जदुकुलराय । दीन्हो कह प्रभु नै तुम्हैं हमकों देहु दिखाय ॥४२॥ बिप्र सुदामा को नगर है यह चतुर सुजान । करी कृपा यह कृस्न नै दीन्हौं द्विज को दान ॥४३॥ दैखै कहा गुपाल की गुप्तदसा द्विजदीन । जौ लौं प्रकट भयो नहीं तौ लों रह्यो मलीन ॥४४॥ हय गयंद रथ पालकी मनिमँत औं पट कोट । सहस संख की संपदा द्वारावति लगि छोट ॥४५॥ कवित्त ढारि कै उठाई बनिआई के तेऊ दिनन, हिये सूलहू न आई रही तीनि कोने की । जहां लगे हीरालाल थारे औ पिटारे रानी, बैठी तन गोरे बसै थोरी रही जोने की । सबसों पुकारत हौं मारत हौं पेट गहि, बेगि डारौ टारि यह बात नहीं होने की । केते घर छोड़ि मो गरीब ही सों बैर कियो, मेरी मढ़ी ढाहि गढ़ी कौने करी सोने की ॥४६॥

सुदामा-चरित / १०६ चौंतरा उजारि कोऊ चामीकर-धाम कियो, छानी तो उपारि डारि छाई चित्रसारी जू । जौ हौं होतो घर पै तो काहे को उठन देतो, होनहार ऐसी खोटी दसाई हमारी जू । हौं तो हो न, काहू लोभ काहू को दिखायौ वाहि, महल उठाय लयो हाय ! सुखकारी जू । लामी लूमवारी दुःख सूल को दलनहारी, गैया बनवारी काहू सोऊ मारि डारि जू ॥४७॥ दोहा द्वारपाल त्रिय एक सों कहि पठयो यह बात । सुनत चली आनंद भरी पुनि पुनि पुलकित गात ॥४८॥ सवैया तोरि डारी झोपरी करे हैं रुचि धौरहर, सुरपुर ध्रुवलोक गार गार ग्रसे हैं । अंग अंग पांति पांति लागे मनि मानिक हैं, संपदा कि भीतिन प्रबाल लाल लसे हैं । कृष्न की कृपा तें रिद्धि सिद्धिन समेत सब, कामधेनु कामतरु ते ही आनि फँसे हैं । हसि हसि बोलति सुदामा जू की बामा प्यारी, घरै आवौ घर बसे खासे घर बसे हैं ॥४६॥ मैं घर भुलानो भूलि कौन के महल आयौ, जहां लागे लाल जाल बिद्रुम महामनी । कौन की विचित्र नारि करै मनुहारि मैं तो, सकौं न निहारि नखसिख सिद्धि सौं सनी ।

११० / सुदामा-चरित द्वारिका बिहारी गिरधारी सों मिलन गयौ, भयौ नहीं काम कछु आय जिय सों बनी । जहां हो निपुन धाम तहां मेरो कौन काम, कांपै त्यों-त्यों ब्राह्मन बुलावै ज्यों-ज्यों ब्राह्मनी ॥५०॥ दोहा कही कथा सब आदि की जहि विधि सिक्षा दीन्हि। सुहिध सुदामा कों भई परी ब्राह्मनी चीन्हि ॥५१॥ चीन्हि ब्राह्मनी आपनौ कियो कृष्ण को ध्यान । मो जड़ पर ऐसी कृपा कीन्हीं कृपानिधान ॥५२॥ सवैया चंपे की पिराका है कि सोने की सिरका है कि, संपा ही को भाग है कि कला कोऊ न्यारी है । सुकवि नरोत्तम कै भूतल को भूषन है, कै चकोर पूषन कि पुन्य की उजारी है। मेरी अभिलाषा है कि कामतरुसाखा है कि, गीरवान भाषा है कि सुधाकंद क्यारी है। राग है कि रूप है कि रस है कि जस है कि, तन है कि मन है कि प्रान है कि प्यारी है ॥५३॥ दोहा मनमंडित थारा कनक सूपोदन लै राखि । सुरभीपय बेला पृथक् धर्यो कृष्नजू भाखि ॥५४॥ कंदजुक्त ज्याउर धरी पछियाउर बहु भांति । कहि न जाति मुख एक सों बहु बिजति की जाति ॥५५॥

सुदामा-चरित / १११ कवित्त कृपा कीन्हीं भारी मानियारी निरधारी तुम्हें, सुख के समूह चले आवैं छितिछोर तें । दसा जो हमारी सोऊ अधिकारी सों तिहारी, प्यारे भारी जानि कै निहारि कृपा कोर तें । पंडित हौं बड़ो कहा भूले गज बाजि देखि, कृष्न की कृपा तें धन होत बहुजोर तें । रुक्मिनीरमन के चरन दरसन ही ते, सबै सुख बरसें है आनि चहुं ओर तें ॥५६॥ दोहा सोचत जो आनंद करौ भरौ मोद मन माहिं। भक्ति करौ यदुनाथ की अब संसै कछु नाहिं ॥५७॥ बिप्र सुदामा सहित तिय उमगे परमानन्द । नितप्रति सुमिरन करत हैं हिय धरि करुनाकंद ॥५८॥ कृष्न सुदामा मित्रई कह्यो नरोत्तमदास । कहत सुनत जो हित करै ताको कबहुँ न त्रास ॥५६॥ कुण्डलिया चरित सुदामाकृष्न को पढ़ै गुनै करि हेत । ताकों सगरी संपदा कृष्न कृपा करि देत । कृष्न कृपा करि देत बात सांची यह मानौ । यामें कछु न असत्य सत्य करि सत्य सु जानौ ।

११२ / सुदामा-चरित मानौ सत्य प्रमान झूठ जग है न कृष्न को। अनुभवफल सो लहै सुदामा चरित कृष्न को ॥६०॥ दोहा विप्र सुदामा की कथा, कहैं सुनैं चितलाय । ताको श्री जदुबीरपति, निसदिन रहैं सहाय ॥६१॥

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