सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुदामा-चरित / १०३ दोहा मान बड़ाई प्रेमरस गरु आपन अरु नेहु । ये पांचौ तबही गए जबहि कही कछु देहु ॥८॥ कवित्त चल्यौ है सुदामा कहै बात घर रामजी सों, मांगिहौं न दाम तासों सांची ही कहत हौं । जो पै मोहिं आपहिं ते बूझिहैं बैकुंठनाथ, तब हों कहांगो प्रभु खुसी ही रहत हौं । अबहूँ विचारि दुखे सुखे दिन टारि कित, पठवै मुरारि जो पै आपदा लहत हौं । विना दाम धाम फिरि ऐहौं भेंटि स्यामजी सों, तेरे कहें राम की सो लठिया गहत हौं ॥६॥ दोहा मो मरने को नेम है मरूँ तो हरि के द्वार । कबहूं तों हरि पूछिहैं कौन मरो दरबार ॥१०॥ कवित्त काँपै सुरपति नरपति काँपे ठौर-ठौर, आगम जनायो द्विजवंत जिय बामा के । छाँड़ि दई आस कइलासहू की महा ईस, सोच ब्रह्मादिकहू सकल सुखधामा के । डरपे कुबेर डगमगत सुमेर भए, जानि डर कर्यो राम गुनकर नामा के । एते हहराने घहराने हरि हितू जानि, द्वारिका की ओर पग धरत सुदामा के ॥११॥