भारतकोश
सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

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१०४ / सुदामा-चरित दोहा करि प्रनाम गनपति सुमिरि पहुँचि गए हरि द्वार । देखि भीर सब नृपन की लागे करन विचार ॥१२॥ यह सुनि ड्यौढ़ी पै कह्यो द्वारपाल सकुचात । महाराज द्विज एक को कहत सन्देस लजात ॥१३॥ सुन्यौ सुदामा नाम जब तब सुधि रही न और । उठि दौरे परजंक तें तजि तरुनिन को झौर ॥१४॥ सुन्दर कनक परात में धर्यौ सलिल ज्यों दास । पगधोवन कों आप ही बैठे जगत निवास ॥१५॥ कुसल क्षेम पूछत लगे कहौ सुदामा मित्र । भाभी ने कछु कहि दियौ भाखो परम विचित्र ॥१६॥ तुम तौ चतुर सुजान हौ जानत मो मन चित्त । एक मास में द्वै परै सौ माकों है नित्त ॥१७॥ तब तौ दिन कछु और हे अब आए कछु और । नित होवैगी द्वादसी तुम चित्त राखौ ठौर ॥१८॥ गुरु सेवा दुर्लभ महा चित दै करै जो कोय । जो मन में इच्छा करै सो सब पूरन होय ॥१९॥ पवन झकोरत तीव्र सों सीत भयो अधिकाय । काठभार मस्तक धर्यौ हाकों लियो छिपाय ॥२०॥ बहुत भांति रक्षा करी आप रहे दुख मांहि । तुम्हरी प्रीति अनन्त है उऋन होहुँ मैं नाहिं ॥२१॥