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सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

११० / सुदामा-चरित द्वारिका बिहारी गिरधारी सों मिलन गयौ, भयौ नहीं काम कछु आय जिय सों बनी । जहां हो निपुन धाम तहां मेरो कौन काम, कांपै त्यों-त्यों ब्राह्मन बुलावै ज्यों-ज्यों ब्राह्मनी ॥५०॥ दोहा कही कथा सब आदि की जहि विधि सिक्षा दीन्हि। सुहिध सुदामा कों भई परी ब्राह्मनी चीन्हि ॥५१॥ चीन्हि ब्राह्मनी आपनौ कियो कृष्ण को ध्यान । मो जड़ पर ऐसी कृपा कीन्हीं कृपानिधान ॥५२॥ सवैया चंपे की पिराका है कि सोने की सिरका है कि, संपा ही को भाग है कि कला कोऊ न्यारी है । सुकवि नरोत्तम कै भूतल को भूषन है, कै चकोर पूषन कि पुन्य की उजारी है। मेरी अभिलाषा है कि कामतरुसाखा है कि, गीरवान भाषा है कि सुधाकंद क्यारी है। राग है कि रूप है कि रस है कि जस है कि, तन है कि मन है कि प्रान है कि प्यारी है ॥५३॥ दोहा मनमंडित थारा कनक सूपोदन लै राखि । सुरभीपय बेला पृथक् धर्यो कृष्नजू भाखि ॥५४॥ कंदजुक्त ज्याउर धरी पछियाउर बहु भांति । कहि न जाति मुख एक सों बहु बिजति की जाति ॥५५॥

सुदामा-चरित / १११ कवित्त कृपा कीन्हीं भारी मानियारी निरधारी तुम्हें, सुख के समूह चले आवैं छितिछोर तें । दसा जो हमारी सोऊ अधिकारी सों तिहारी, प्यारे भारी जानि कै निहारि कृपा कोर तें । पंडित हौं बड़ो कहा भूले गज बाजि देखि, कृष्न की कृपा तें धन होत बहुजोर तें । रुक्मिनीरमन के चरन दरसन ही ते, सबै सुख बरसें है आनि चहुं ओर तें ॥५६॥ दोहा सोचत जो आनंद करौ भरौ मोद मन माहिं। भक्ति करौ यदुनाथ की अब संसै कछु नाहिं ॥५७॥ बिप्र सुदामा सहित तिय उमगे परमानन्द । नितप्रति सुमिरन करत हैं हिय धरि करुनाकंद ॥५८॥ कृष्न सुदामा मित्रई कह्यो नरोत्तमदास । कहत सुनत जो हित करै ताको कबहुँ न त्रास ॥५६॥ कुण्डलिया चरित सुदामाकृष्न को पढ़ै गुनै करि हेत । ताकों सगरी संपदा कृष्न कृपा करि देत । कृष्न कृपा करि देत बात सांची यह मानौ । यामें कछु न असत्य सत्य करि सत्य सु जानौ ।

११२ / सुदामा-चरित मानौ सत्य प्रमान झूठ जग है न कृष्न को। अनुभवफल सो लहै सुदामा चरित कृष्न को ॥६०॥ दोहा विप्र सुदामा की कथा, कहैं सुनैं चितलाय । ताको श्री जदुबीरपति, निसदिन रहैं सहाय ॥६१॥

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