सुगम चिकित्सा
Sugam Chikitsa
आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा
स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)
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हमारे रहने का घर
सकखी भी उसपर बैठ जाय तो हमें मालूम हो जाती है। इस चमड़े में दो अस्तर हैं। ऊपर का अस्तर बहुत पतला है, उसका काम नीचे के अस्तर की रक्षा करना है। इसीमें जलने से फफोला उठता है। यह हमेशा नई बनती जाती है और ऊपर से घिसती जाती है। मिहन्त करने से वह मोटी बन जाती है। इसीसे नाखून भी बनते हैं। इसी के नीचे मोटी कोमल चमड़ी है। इसीमें छूने की ताकत है। पसीने की थैलियाँ इसीमें हैं। फिक्की और चमड़े के बीच में वह जगह है जहाँ देह का रंग रहता है। चमड़े में लाखों छेद हैं जिनका काम पसीने के साथ मैल और जहर को शरीर से बाहर निकालना। ये छेद इतने छोटे-छोटे हैं कि चमड़े पर १ रुपया रखा जाय तो उसके नीचे ३ हजार छेद आजाते हैं। जो आदमी चदन को मैला रखते हैं उनके ये छेद रुक जाते हैं और वह बीमार हो जाता है। चमड़ी के ऊपर हथेली और तलुओं को छोड़कर छोटे-छोटे बाल होते हैं। सिर पर और पुरुषों की डाढ़ी मूछों पर ज्यादा हो जाते हैं। इनकी जड़ें चमड़ी में घुसी होती हैं और लोहू की नालियों से वे पाले जाते हैं।
इस देहरूप घर में छाती और पेट की कोठरियों में बहुत-सा सामान भरा हुआ है। यह सब सामान चढ़े घर का सामान काम का है। इन्हींसे घर का सारा कारवार चलता है।
इनमें २ फेफड़े, १ दिल, आस की नाली, खाने की नाली। ज़िगर, तिन्नी, गुर्दे, मसाने, गर्भाशय, छोटी आंत, बड़ी आंत आदि-