भारतकोश
सुगम चिकित्सा

सुगम चिकित्सा

Sugam Chikitsa

आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा

स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

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सुगम चिकित्सा

आदि खास हैं। जिनका खुलासा वर्णन हमने अन्यत्र किया है। इन सबको अत्यन्त मावधानी से रखा गया है।

दाँत हमारे घर की चक्की हैं। ये ३२ हैं। छोटे बच्चों के दाँत नहीं होते क्योंकि उनकी उनको जरूरत नहीं रहती। बचे ज्यों-ज्यों बड़े होते जाते हैं, दाँत निकलते जाते हैं। पहले आगे घर की चक्की के निकलते हैं फिर पीछे के। परन्तु बच्चों का जावड़ा छोटा होता है। जब वह बड़ा हो जाता है तब यह छोटी चक्की काम नहीं देती। सो ये दूध के दाँत गिर जाते हैं और नये दाँत निकलते हैं जो जीवन-भर काम देते हैं। बच्चों के दाँत बीस होते हैं। बड़ों के ३२ होते हैं जो २० वर्ष की आयु में पूरे होजाते हैं। दाँतों को बचपन ही से साफ रखने की आदत जितकी नहीं होती, वे जल्द ही दाँतों को खो देते हैं और तकलीफ पाते हैं।

इस घर का तार घर मस्तिष्क में है। वह खोपड़ी में रखा है। इसकी शकल अखरोट के गुदे के समान है। रीढ़ की हड्डी में होकर इस में दो तार जुड़े हुए हैं। एक संवाद मस्तक तक पहुँचाता है, दूसरा मस्तक से संवाद ले जाता है। इन तारों के जाल सारे शरीर में फैले हुए हैं। अगर कहीं सुई चुभोई जाय तो किसी-न-किसी तार में जरूर चुभ जायगी। सोचने-विचारने की शक्ति इसी में है। इसी में खराबी आने से आदमी पागल हो जाता है। अगर किसी इन्द्री का कोई तार कट जाता है तो उसमें छूते की शक्ति नहीं रहती।