सुगम चिकित्सा
Sugam Chikitsa
आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा
स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)
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परिभाषा-सम्बन्धी खास-खास बातें
पुट पाक
भर देना और उसमें आग लगा देना। जब सब जलकर ठण्डा होजाय तो भीतर से दवा को निकाल लेना, सम्पुट करने के लिए दो शकोंरों में दवा बन्द कर अच्छी तरह कपट मिट्टी करके सुखा लेना चाहिए।
आसव के लिए दवा को कूटकर गर्म पानी में भिगोना होता है। और अरिष्ट के लिए पकाना होता है। बाद में गुड़ या चीनी
आसव-अरिष्ट मिलाकर चिकने बर्तन में रखकर सन्धान करना होता है। सन्धान करने में इस बात का ध्यान
रखना होता है कि अधिक सन्धान होकर कहीं सिरका न होजाय। आसव का ठीक सन्धान हुआ है या नहीं इसे जानने के लिए यह तरकीब है कि एक दीवासलाई जलाकर बर्तन के भीतर जलानी चाहिए, अगर वह बुम जाय तो जानना कि आसव तैयार है। यह भी खयाल रखना पड़ता है कि उसमें मद ५ प्रतिशत से अधिक न हो, नहीं तो सरकारी क़ानून का भँकट आता है।
दवाइयों में घी और तेल पकाने से पहले उसे मूछान करने से उसके गुण बढ़ते हैं। इसकी विधि यह है कि तिल के तेल की
मूछा करनी हो तो लोहे की कढ़ाई में तेल को घी और तेल पकाना चढ़ाना, जब भाग बैठ जाय तो उतार कर थोड़ा ठण्डा होनेपर, उसमें पिंसी हुई हल्दी का पानी, फिर मजीठ का पानी, फिर लोथ-मोथा, आँबला, बहेड़ा, हरड, केबड़े का फूल, बेमवाला इन सब चीजों की तेल से आठवों भाग मिलाकर तेल का चौगना पानी देकर पाक करना और थोड़ा पानी रहते नीचे