सुगम चिकित्सा
Sugam Chikitsa
आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा
स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)
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परिभाषा-सम्बन्धी खास-खास बातें
पुट पाक
भर देना और उसमें आग लगा देना। जब सब जलकर ठण्डा होजाय तो भीतर से दवा को निकाल लेना, सम्पुट करने के लिए दो शकोंरों में दवा बन्द कर अच्छी तरह कपट मिट्टी करके सुखा लेना चाहिए।
आसव के लिए दवा को कूटकर गर्म पानी में भिगोना होता है। और अरिष्ट के लिए पकाना होता है। बाद में गुड़ या चीनी
आसव-अरिष्ट मिलाकर चिकने बर्तन में रखकर सन्धान करना होता है। सन्धान करने में इस बात का ध्यान
रखना होता है कि अधिक सन्धान होकर कहीं सिरका न होजाय। आसव का ठीक सन्धान हुआ है या नहीं इसे जानने के लिए यह तरकीब है कि एक दीवासलाई जलाकर बर्तन के भीतर जलानी चाहिए, अगर वह बुम जाय तो जानना कि आसव तैयार है। यह भी खयाल रखना पड़ता है कि उसमें मद ५ प्रतिशत से अधिक न हो, नहीं तो सरकारी क़ानून का भँकट आता है।
दवाइयों में घी और तेल पकाने से पहले उसे मूछान करने से उसके गुण बढ़ते हैं। इसकी विधि यह है कि तिल के तेल की
मूछा करनी हो तो लोहे की कढ़ाई में तेल को घी और तेल पकाना चढ़ाना, जब भाग बैठ जाय तो उतार कर थोड़ा ठण्डा होनेपर, उसमें पिंसी हुई हल्दी का पानी, फिर मजीठ का पानी, फिर लोथ-मोथा, आँबला, बहेड़ा, हरड, केबड़े का फूल, बेमवाला इन सब चीजों की तेल से आठवों भाग मिलाकर तेल का चौगना पानी देकर पाक करना और थोड़ा पानी रहते नीचे
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उतारना । इसके बाद सात दिन तक योंही रहने देना । इसके बाद जिन-जिन चीजों का तेल पकाना हो, उनका वजन अगर नुसखे में न लिखा हो तो जिनकी लुगदी हो वह कुल मिलाकर वजन में तेल से चौथाई हो और जिनका काढ़ा हो या दूध, पानी, रस, आदि हो, वह तेल से चीगना हो । द्रव पदार्थ कोई न होतो सिर्फ पानी ही चीगना हो ।
सरसों के तेल की मूछों के लिए हल्दी, मजीठ, आँवला, मोथा, बेल की छाल, अनार की छाल, नागकेसर, काला जीरा, नेत्रवाला, तालुका, बहेड़ा—ये सब चीजें डालकर पकाना चाहिए ।
घी की मूछों के लिए उसे आगपर चढ़ाकर जब भाग भर जाय तब उतारकर ठण्डा कर, पहले हल्दी का पानी, फिर नींबू का रस, उसके बाद पिप्सी हुई हरड़, आँवला, बहेड़ा, और मोथा डालना । और चीगना पानी डालकर पकाना । पानी जलने पर उतार लेना । चार सेर घी में सब द्रव्य आठ तोला होना ।
बीमार और बीमारी की प्रकृति के अनुसार ही दवा खाने का समय नियत करना चाहिए । पित्त के विकार में जुलाव आदि
दवा खाने का समय
होतो, सुबह दवा देनी चाहिए । अपानवायु की खराबी होने पर भोजन के पहले समानवायु के प्रकोप होने पर मध्य में; न्यान वायु के प्रकोप में भोजन के बाद; उदान के प्रकोप में शाम को भोजन के साथ और प्राणवायु के प्रकोप में शाम को भोजन के बाद दवा देनी चाहिए । हिचकी, बेहोशी, वॉयटे, कम्पन आदि के
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आस में तथा जुकाम में अडुसे का पत्ता, तुलसी का पत्ता, पान, अदरक अडुसे की छाल, मुलहटी, कटेहली कटहल, और कूठ का काढ़ा, वच, तालीसपत्र पीपल, काकड़ा सींगी और वंशलोचन का चूर्ण। वात-आँस में बहेड़े का काढ़ा। खून की डलटी होने पर अडुसे के पत्ते का रस, या बकरी का दूध। घण्टू-कामला आदि में पित्तपापड़ा या गिलोय का रस। दस्त लाने के लिए—निसोत, सनाय का पानी, या कुटकी का काढ़ा। पेशाब साफ़ लाने के लिए—शोरे का पानी या गोखरू का काढ़ा। पेशाब रोकने के लिए—गुलर या जामुन की बीज का चूर्ण। प्रमेह रोग में—कच्छी हल्दी का रस, आँवले का रस, प्रदर में—गिलोय का रस। रजोदर्शन के लिए—दुरदुर के पत्ते का रस, सन्दनिम में अजवाइन, अजमोद और सोंफ़ का पानी या पीपल, पीपला मूल, मिरच, चाय, सोठ और हींग का चूर्ण। कृमि रोग में विडंग का चूर्ण। वमन रोग में बड़ी इलायची का काढ़ा। वायु रोग में त्रिफला का पानी, सताबर का रस, वीर्य वृद्धि के लिए मक्खन-मलाई का अनुपान ठीक होता है।
रोग और रोगी के बलाबल को देखकर उक्त अनुपानों में काढ़ा या भिगोया हुआ पानी एक छटॉक अथवा दवा का रस दो लोला। चूर्ण का अनुपान हो तो शहद के साथ लिया जाय। पर पित्त रोग में शहद न लिया जाय।
:२१:
धातुओं की भस्म
सोना-चाँदी आदि धातुओं को भस्म करने से पहले उन्हें शुद्ध करना चाहिए। सोना-चाँदी और ताम्बा आदि धातुओं को बहुत पतला पत्तर करके आग में गर्म कर पहले मीठे शोधन तेल में, फिर गाय के मट्ठे में। फिर काँची में इस के बाद गोमूत्र में और अन्त में कुरथी के काढ़े में सात-सात बार बुझाना। राँग और जस्त गलाकर बुझाना चाहिए।
सोने के पत्तरो को कैंची से काटकर बराबर शुद्ध पारे में खरल करके गोला बनाना। फिर एक मिट्टी के शकोरे में सोने के वजन बराबर गन्धक का चूर्ण रख, ऊपर वह सोने की भस्म गोला रख, उसपर गन्धक भरकर दूसरे शकोरे से ढक देना। फिर कपर-मिट्टी करके ३० जङ्गली उपलों की आँच में फूंकना। ठण्डा होने पर बाहर निकालकर फिर उसी तरह पारे के साथ घोटकर पकाना। इसी तरह १४ बार करने से सोना भस्म होजायगा।
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सोने की भस्म ठण्डी, वीर्यवर्धक बलदायक, भारी, रसायन, कड़वी, कसैली, पुष्टिकारक, नेत्रों को शक्तिदाता, हृदय को त्रिष, बुद्धिदाता, आयु को बढ़ाने वाली, कान्ति और सोने की भस्म के गुण वाणी को उत्तम करने वाली, सब प्रकार के विषों का नाश करने वाली, तथा क्षय की नाशक है। इसकी मात्रा दो रस्ती है।
सोने की तरह चाँदी का भी पत्तर बनाकर बराबर पारे के साथ खरल में घोटना, फिर बराबर हर्ताल, चान्दी की भस्म गन्धक और नींबू के रस में खरलकर, सोने की तरह फूंक लेना। इसी तरह दो-तीन पुट देने में चाँदी की भस्म हो जाती है।
चान्दी की भस्म के गुण—चान्दी की भस्म, ठण्डी, दस्तावर, आयु स्थिर करने वाली और प्रमेह को आराम करने वाली है। इसकी मात्रा दो रस्ती है।
बराबर पारा और गन्धक को बड़े कागजी नींबू में कड़ली कर ताम्बे के पत्र पर लेप करदे। फिर उन्हें दो शकोरों में बन्दकर ताम्बे की भस्म कपर-भिट्टी करे और पाँच सेर जड़ली उपलों में रखकर फूंक दे। ताम्बे की भस्म खाने से जी मिचलाया करता है। इस लिए ताम्बे की भस्म को नींबू के रस में घोटक गोला बनाना और उसे धूप में सुखाना, फिर उसे एक सावुत जमीकन्द में रखकर उसपर कपरीटी कर धूप में सुखाना। सुखने पर गजपुट में फूंक लेना। इस तरह करने पर
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धातुओं की भस्म
उसे खाने से उल्टी नहीं होती। इस क्रिया को अमृतीकरण कहते हैं। ताम्रभस्म की मात्रा दो से चार रत्ती तक है।
ताम्रभस्म के गुण—ताम्बे की भस्म दस्तावर, कोढ़, खास, खाँसी, बवासीर, शूल, सूजन, उदररोग, पाण्डु रोग, और दाह को दूर करती है।
लोहे की कढ़ाई में रॉंग गलाकर उसमें रॉंग के वजन को बराबर पहले हल्दी का, फिर अजवाइन का, फिर जीरे का; उसके बाद
रॉंग की भस्म इमली की छाल का, और पीपल की छाल का चूर्ण एक-एक कर बारी-बारी से डालता जाय
और कलछी से चलाता जाय। रॉंग की सफेद साफ भस्म हो जायगी। इसी तौर पर जस्त की भस्म भी होगी। मात्रा दो से चार रत्ती तक है।
रॉंग की भस्म दस्तावर, गरम, नेत्रों को लाभदायक, कुछ पित्तकारक, प्रमेह, कफ, कृमि, खास, को रॉंग की भस्म के गुण आराम करके वाली है। यह प्रमेह की अत्युत्तम दवा है। इन्द्रियों को थलवान और देह को सुखी करती है।
जस्त की भस्म के गुण—जस्त की भस्म कड़वी, कसैली, ठंडी, आँखों को हितकारी, प्रमेह और पाँडुरोग को फायदेमन्द है। श्वास को आराम करती है।
लोहे की कढ़ाई में सीसा और जवाखार एक साथ धीमी आँचपर चढ़ाना, सीसे की राख होने तक बार-बार उसमें जवाखार
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सीसे की भस्म ढालकर चलाते रहना । जब लाल रंग होजाय तो नीचे उतार पानी से धोकर आँच पर सुखा लेना । इस तरह सीसे की पीली भस्म तैयार होती है । इस की मात्रा चार से छः रत्ती तक है ।
सीसे की भस्म में राज्ञ के समान ही गुण है । स्वास्त्यौर पर वह प्रमेह-नाशक है । अगर सीसे का निरन्तर सेवन किया जाय तो हाथी के समान बल होता है । जीवन स्वीसे की भस्म का गुण बढ़ता है । अग्नि वृद्धि होती है । कामदेव चैतन्य होता है । क्षय, गुल्म, वातविकार, शूल, और बवासीर को आराम करता है ।
रेती के लोहे को गर्म करके दूध, काँजी, गोमूत्र और त्रिफला के काढ़े में तीन-तीन बार बुझाना । दूध, काँजी और गोमूत्र लोहे का दूना, और लोहे का अठगुना त्रिफला, चौगने का लोह भस्म पानी में औटाना, एक भाग पानी रहते छान लेना; फिर लोहे को बीस बार गजपुट में आँच देना । लोहा जितनी बार फूँका जायगा उतना ही अधिक गुणकारी होगा । हजार आँच का लोहा अत्युत्तम होता है । लोहे की उम्दा भस्म पानी पर तैरती है । इसकी मात्रा दो से चार रत्ती तक है ।
लोह भस्म के गुण—लोहा कृषिच्छ है, विष, शूल, सूजन, बवासीर, तिल्ली, पाँडु, प्रमेह और कोढ़ को फायदा करता है ।
मण्डूर भस्म—मण्डूर यानी लोहे की १०० वर्ष की पुरानी कीट को १०० बार तपा-तपा कर गोमूत्र में बुझवा दे । गजपुट में
फूंकने से मएडूर भस्म होजाती है। जो गुण लोहे के हैं वही मएडूर के हैं। इसकी मात्रा १॥ माशे तक है।
भस्म के लिए काला अम्रक लेना चाहिए। पहले काला अम्रक आँच में लाल करके दूध में बुझाना, फिर तपक अलग-अलग कर
चौलाई के रस या किसी खट्टे रस में आठ पहर अम्रक भस्म
भावना देना। इससे अम्रक शुद्ध होता है। शुद्ध
अम्रक चार भाग और चावल का धान एक भाग कमल में एक साथ बाँधकर तीन दिन पानी में भिगो रखना, फिर हाथ से मलकर जब छोटे-छोटे बालू के कण के समान होजाय तब उसकी भस्म करना। इसे धान्याम्र कहते हैं। धान्याम्र को गोमूत्र में घोट कर गजपुट में फूंकने से अम्रकभस्म तैयार होती है। जबतक अम्रक में चमक रहे तबतक वरावर पुट देते रहना चाहिए। हजार पुटी अम्रक उत्तम होता है।
अम्रक भस्म सवा सेर, त्रिफला का काढ़ा दो सेर, गाय का घी एक सेर, सबको इकट्ठा लोहे की कढ़ाई में धीमी आँच पर चढ़ाना, जब सब जल जाय तब छानकर रखना। अम्रक भस्म की मात्रा दो से छः रत्ती तक है।
तीन भाग सोना माखी, एक भाग संधा नमक, बड़े नीवू के रस में, घोटकर लोहे की कढ़ाई में पकाना, और बारबार चलाते
सोना माखी
रहना। जब लोहपात्र लाल हो जाय तो सम-भत्ता कि स्वर्णमादिक शुद्ध होगया। वही स्वर्ण-
मादिक कुल्थी के काढ़े में या तिल के तेल में अथवा मट्टा या चकरी
भुतमात्राशक्त्या
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के दूध में, मर्दन कर गजपुट में फूंकना । इसी भाँति शीघ मादिक मेदगृह्णी और घड़े नीवू के रस में भिगोकर तेज घूष में रखने से शुद्ध होता है ।
सोनामाखी की भस्म हल्की, रसायन, नेत्रों को हितकारी, कोद, सूफन, श्वासीर, प्रमेह, पाण्डु, सोना माखी का गुण कुष्ठ और श्वासीर तथा क्षय को लाभदायक है । इसकी मात्रा छः रत्ती तक है ।
शरुद्ध स्वर्ण माखी—अन्ध कर देती है । कोद और क्षय पैदा करती है । इससे भलीभाँति शोध कर काम में लेना चाहिए ।
तृतिया शोधन—घड़े नीवू के रस में खरल कर सवा सेर उपलों की आँच देने से, फिर तीन दिन दही के पानी की भावना देने से तृतिया शुद्ध होता है । यह नेत्र रोग और विपनाशक है । तथा वमन कारक है ।
गोमूत्र की तरह गन्धवाला, काला रंग वाला, कड़वा, कसैला, शीतल, चिकना, भारी शिलाजीत होता है । पहले उसे गर्म पानी में भिगोकर रखना, फिर कपड़े से एक मिट्टी के शिलाजीत शोधन वर्तन में छानकर दिन-भर घूष में रखना । शाम को पानी के ऊपर की मलाई वर्तन में निकालना । इसी तरह रोख घूष में रखकर मलाई लेना । यही मलाई शोधित शिलाजीत है । असली शिलाजीत आग में देने से लिङ्ग की भाँति ऊपर को उठता है और धुँआ नहीं देता ।
प्रमेह नाशक, गर्म, रसायन, उन्माद, सूजन, क्षय कोद, पथरी,
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धातुओं की भस्म
शोथ, उदर, अपस्कार, वस्तीरोग ववासीर, शिलाजीत के गुण खाँसी, श्वास, और पेशाब के रोगों को फायदा करता है। इसकी मात्रा चार रत्ती से १॥ मासों तक है।
रसौत—रसौत को बड़े नीबू के रस में मिलाकर दिन-भर धूप में रखने से अथवा पानी मिलाकर छान लेने से शोथित होता है।
सिन्दूर—दूध या किसी खट्टे रस की भावना देने से सिन्दूर शुद्ध होता है।
सुहागा—आग पर रखकर खील करने से शुद्ध होता है।
शङ्खादि—शङ्ख सीप, और कौड़ी कौजी में एक पहर दौला-यन्त्र में औटाने से शुद्ध होता है। और कुल्हड़ में रखकर आग में जलाने से भस्म होजाता है।
समुद्रफेन—कागजी नीबू के रस में पीसने से समुद्रफेन शुद्ध होजाता है।
गेरु—गाय के दूध में घिसने या गाय के घी में भूलने से गेरु शुद्ध होता है।
हीराकस—भङ्गुरैया के रस में एक दिन भिगोने से हीराकस शुद्ध होता है।
सात दिन दौलायन्त्रमें गोमूत्र के साथ औटाने से खपरिया शुद्ध होता है। फिर आगपर चढ़ाकर, गल जाने पर
खर्प
क्रमशः संधा नमक डालते हुए ढाक की लकड़ी से चलाते जाना। राख की तरह हो जाने पर नीचे उतार लेने से खर्प तैयार होता है।
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मीठाविष—या मीठा तेलिया, छोटे-छोटे टुकड़े करके, तीन दिन गोमूत्र में भिगोने से शुद्ध होता है। गोमूत्र रोज़ बदलना चाहिए। फिर उसकी छाल निकाल डालना।
जमालगोटा—जमालगोटे के बीज के बीच में जो जीभ होती है उसे निकालकर, दौलायन्त्र में दूध के साथ औटाने से वह शुद्ध होता है।
धतूरे का बीज—कूटकर गोमूत्र में चार पहर भिगो रखने से धतूरे के बीज शुद्ध होते हैं।
अफ्रीम—अदरख के रस की बारह भावना देने से अफ्रीम शुद्ध होती है।
भाँग—पानी से धोकर सुखा लेने से भाँग शुद्ध होती है।
कुचला—घी में भूनने से कुचला शुद्ध होता है।
एक हाँड़ी में थोड़ा गोबर रखकर उसपर एक पान रखकर गोदन्ती हरताल गोदन्त रखना और हाँड़ी का मुँह बाँधकर कपड़ा और मिट्टी का लेपकर चार पहर आग में रखने से गोदन्त ऊपर लग जायगा। वही शुद्ध गोदन्ती है। सब काम में लेना।
भिलावा—पक्का भिलावा जो पानी में डूब जाय लेकर ईंट के चूर्ण में घिसने से शुद्ध होता है।
हींग—लोहे की कढ़ाई में थोड़े घी में भूनने से लाल होनेपर हींग शुद्ध होता है।
नौसादर—चने के पानी में दौलायन्त्र में औटाने से नौसादर शुद्ध होती है। या गर्म पानी में खरल कर मोटे कपड़े से छान कर
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धातुओं की भस्म
पानी में एक वर्तन में रखना, छण्डा होने पर नीचे जो पदार्थ जम जाय वही शुद्ध नौसादर है।
गन्धक शोधन—लोहे की कट्वाई में थोड़ा घी गरम कर, उसमें गन्धक चूर्ण डालना। गन्धक गल जाने पर पानी मिलाए दूध में डालना, इसी तरह सब गन्धक गल जाने पर पानी मिलाए दूध में डालना, फिर अच्छी तरह धोकर काम में लेना।
हरताल—तबक़ी हरताल पहले सफेद कोहड़े के रस में, फिर चूने के पानी और तेल में। एक-एक बार दौलायन्त्र में औटाने से हरताल शुद्ध होता है।
हरताल भस्म—एक पका हुआ काशीफल लेकर हरताल की शुद्ध हली को चूने में लपेटकर उसमें रख कपरोटी कर गजपुट की आँच दे तो हरताल भस्म हो। यह हरताल भस्म कोढ़, आतशक, और रक्त-विकार की उत्तम दवा है। मात्रा दो से छः रत्ती तक है।
हिंगुल शोधन—हिंगुल को नीवू के रस और भेड़ के दूध में सात-सात भावना देने से हिंगुल शुद्ध होता है। भेड़ का दूध न मिले तो भैंस के दूध ही से सात भावनाएँ देनी चाहिए। इससे हिंगुल शुद्ध होता है।
हिंगुल से जो पारा निकाला जाता है, उसकी विधि यह है कि हिंगुल को चूरा करके एक मोटे कपड़े में पोटली बाँधें। उसपर
हिंगुल के बराबर वजन का कपड़ा लपेट दो। यह गोला एक चौड़े मुंह की हाँडीमें रखकर उसपर दूसरी हाँडी रखो, बीच में कोई चीज अट-
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कादो, जिससे उसका मुँह कुछ खुला रहे, और गोले में आँच लगादो। ठण्डा होने पर दोनों हाँडियों में से पारा इकट्ठा करके कपड़े में छान लो। यह पारा शुद्ध होता है।
कज्जली—शुद्ध पारा और शुद्ध गन्धक बराबर लेकर उस समय तक खरल किया जाय जबतक कि दोनों मिलकर काजल की तरह काले न हो जायँ और चमक न जाती रहे। कहीं-कहीं दूना गन्धक मिलाकर कज्जली बनाते हैं।
पारा और गन्धक की कज्जली कपरीटी की हुई आतशी शीशी में भरकर एक हाँडी में अठन्नी के बराबर पेंदी में छेद कर,
रस सिन्दूर उसपर अम्भक का एक टुकड़ा रख, उसपर शीशी टिकाकर हाँडी को रेत से गले तक भरदे।
फिर उसे चूल्हे पर चढ़ाकर पहले हल्की फिर तेज़ आँच क्रमशः दे। बोटल से पहले नीले रङ्ग का धुँआ निकलेगा। फिर धुँआ बन्द होकर जब आँच निकलने लगे तब आग बुझा दे और ठण्डा होने पर बोटल तोड़ कर ऊपर के भाग में लगे हुए रस सिन्दूर को निकाल ले।
पारा गन्धक की कज्जली में एक भाग सोने का पत्तर डाल कर भलीभाँति धीग्वार के रस में घोटे। फिर चन्द्रोदय रस सिन्दूर की भाँति पाक करे तो चन्द्रोदय सिद्ध हो। इसकी मात्रा एक चावल है। और विशेष अनुपान से सब रोगों में काम में आता है।
१२२:
काम के शास्त्रीय नुसखे
काढ़े
१ गुड्ड्यादि काढ़ा—गिलोय, धनिया, नीमकी छाल, पद्मराख, लालचन्दन, इन चीजों के काढ़े को गुड्ड्यादि कहा गया है। इसमें मधु प्रकार के नये ज्वर, नये दाह, वमन, अरुचि दूर होती है। अग्नि चैतन्य होती है।
२ लुद्रादि काढ़ा—कटेहली, चिरायता, कुटकी, साँठ, गिलोय, और थरंड की जड़। इन छः दवाइयों का काढ़ा पीने से मधु प्रकार का ज्वर जिसमें ग्वाँसी, आस तथा कन्ड भी हैं, आराम होता है।
३ लघुलुद्रादि काढ़ा—कटेहली, साँठ, गिलोय, और थरंडी की जड़, इन चार दवाइयों का काढ़ा पीने से प्रचल कफ वायु ग्वाँसी माँस, अरुचि पीठ या छाती का दर्द वाला ज्वर भी आराम होता है।
४ दशमूल काढ़ा—शालपर्णी, पृष्ठिपर्णी, छोटी कटेहरी, बड़ी कटेहरी, गोखरू, बेलगिरी, थरन्जी, स्योनाक, कम्भारी, पाहुल, इन दस चीजों का काढ़ा पीने से वात, कफ का ज्वर, न्युमोनिया, प्रगृति ज्वर, मल्लिपात ज्वर दूर होता है। इस काढ़े में पीपल का चूर्ण डालना चाहिए।
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५ अष्टादशाङ्गकाढ़ा—दशमूल, चिरायता, कुटकी, नागरमोथा, धनिया, इन्द्र जौं, सांठ, देवदारु, और गजपीपल, इन अठारह दवाइयों का काढ़ा सब प्रकार के सन्निपात ज्वरों तथा निमोनिया में अत्यन्त लाभदायक है।
६ देवदावादि काढ़ा—देवदारु, वच, कूठ, पीपल, सांठ, कायफल, नागरमोथा, चिरायता, कुटकी, धनिया, बड़ी हरड, गजपीपल, धमासा, गोखरू, कटेहली, अतीस, गिलोय, काकड़ासौंगी, काला जीरा, लाल धमासा, इन बीस दवाइयों का काढ़ा पीने से प्रसूति, रोग, शूल, खाँसी, ज्वर, मूछा, खास, कफ वायु, और मस्तक पीड़ा दूर होती है।
७ धान्य पंचक—धानिया, नेत्रवला, चेलगिरी, नागरमोथा, और सांठ, इनका काढ़ा पेट की आँच को निकालता है। तथा दीपन पाचन करता है।
८ धातक्यादि काढ़ा—धाय के फूल, चेलगिरी, लोध, नेत्रवला और गजपीपल का काढ़ा शीतल करके तथा शहद मिलाकर पिलाने से बच्चों को हरे-पीले दस्तों में बहुत फायदा होता है।
९ पुनर्नवादि काढ़ा—साँठ की जड़, हरड, नीम की छाल, दारु हल्दी, कुटकी, पटोल पत्र, गिलोय, और सांठ, इन का काढ़ा गोमूत्र में मिलाकर पीने से पाण्डुरोग, खाँसी, पेट की बीमारियाँ, खास और शूल तथा सर्वाङ्ग की सूजन दूर होती है।
१० कटेहली का काढ़ा—कटेहली के काढ़े में पीपल का चूर्ण पीने से खाँसी तुरन्त दूर होती है।
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काम के शास्त्रीय नुसख
११ रास्तादि काढ़ा—रास्ता, गिलोय, देवदारु, सोंठ, और अरण्ड की जड़ का काढ़ा पीने से वायु की सब बीमारियाँ दूर होती हैं।
१२ मंजिष्ठादि काढ़ा—मजीठ, हरड, बहेड़ा, आँवला, कुटकी, बच, दारुहल्दी, गिलोय, नीम की छाल, इन नौ दवाइयों का काढ़ा बात रक्त, खाज, फोड़ा-फुंसी, कोढ़ और सब प्रकार के रक्त विकार में फायदेमन्द है।
चूर्ण
१ त्रिफला चूर्ण—हरड, बहेड़ा, आँवला, बराबर चूर्ण करके फंकी लेने से प्रमेह, सूक्ष्म, विषम स्वर, कफ, पित्त, और कुछ आराम होता है। त्रिफला का चूर्ण विषम मात्रा में धी और शहद के साथ लेने से सब प्रकार की आँखों की बीमारी आराम होती है।
२ त्रिकुटा चूर्ण—सोंठ, मिर्च काली, पीपल, तीनों का चूर्ण अधिक वर्धक, कफ, चर्बी, कोढ़, जुकाम, अरुचि, आसदोष प्रमेह, वायु गोला, और गले की बीमारियों को आराम करता है।
३ सुदर्शन चूर्ण—हरड, बहेड़ा, आँवला, हल्दी, दारुहल्दी, छोटी कटेहली, बड़ी कटेहली, कचूर, सोंठ, मिरच, पीपल, पीपरा मूल मूर्वा, गिलोय, धमासा, कुटकी, पित्तपापड़ा, नागरमोथा, चायमाण, नेत्रवाला, नीम की छाल, पोहकरमूल, सुलहटी, कुडे की छाल, अजवायन, इन्द्रजौ, भारंगी, संहजने के वीज, फिटकरी, बच, दारचीनी, पद्मसाख, चन्दन, अतीस, खरेटी, शालपर्णी, पुष्ट
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पर्णी, सतावर, असगन्ध, लौंग, वंशलोचन, कमलगद्गा, विदारी-बांद, पत्रज, जावन्नी, तालीसपत्र इन सब के वजन से आधा चिरायता डाल चूर्ण करले। यह सुदर्शन चूर्ण है। इसे ताजा पानी से सेवन करने से वात पित्त, कफ हृद, सन्निपात के ज्वर, विषम ज्वर, आगन्तुक ज्वर, धातु जन्य ज्वर, मानस ज्वर, इत्यादि सम्पूर्ण ज्वर, शीत ज्वर, एकादिक, आदि ज्वर, मोह, तन्त्रा, भ्रम, चूपा, भ्रास, खौंसी, पाण्डु, हृदय रोग, कामला, शूल आदि सब दूर होते हैं।
४ हरीतक्यादि चूर्ण—काला नमक, बड़ी हरड, काली मिर्च, सोठ, चारों बराबर ले इन्हें अलग-अलग (नमक के सिवा) घी में भून कर चूर्ण कर छः-छः मास की मात्रा में दिन में तीन बार दही के साथ खाने से तथा खिचड़ी-दही पथ्य लेने से पेंचिस को आराम होजाता है।
५ गंगाधर चूर्ण—नागरमोथा, इन्द्र जौ, बेलगिरी, पठानी-लोध, मोचरस और धाय के फूल, इनका चूर्ण करके छाछ में गुड़ मिलाकर उसके साथ चूर्ण को पीवे तो सब प्रकार का अतिसार आराम हो।
६ लवंगदि चूर्ण—लौंग, कपूर, इलायची, दालचीनी, नाग-केसर, जायफल, खस, सोठ, काला जीरा, अगर, वंशलोचन, जटामांसी, नीला कमल, पीपल, सफेद चन्दन, तगर, नेत्रवाला और ककोल, इनका चूर्ण कर, चूर्ण से आधी मिश्री मिला, उपयुक्त मात्रा में सेवन करे। इससे भ्रमिन् प्रदीप होती है, रुचिकारक है, पुष्टिकारी है, वात, पित्त, कफ को शमन करता है। हृदय रोग,
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काम के शास्त्राय नुसख
कण्ट रोग, खांसी, हिचकी, पीनस, तथ, श्वास, अतिसार, अरुचि, संग्रहणी, प्रमेह सबको लाभदायक हैं ।
७ जालीफलादि चूर्ण—जायफल, लोंग, इलायची, तमालपत्र, दालचीनी, नागकेसर, कपूर, सफेद चन्दन, कालितिल, वंशलोचन, तगर, श्रांवला, तालीस पत्र, पीपल, हरड, कालाजीरा, चीते की छाल, सोंठ, वायविडंग और काली मिर्च सब बराबर और सबके बराबर भाँग, और फिर सबके बराबर मिश्री । मात्रा एक तोला शहद के साथ । संग्रहणी, खांसी, श्वास, अरुचि, क्षय, वायु, कक का विकार और पीनस आराम होती है ।
८ महाखाण्डव चूर्ण—काली मिर्च, नाग केसर, तालीस, सेधा-नमक, काला नमक, खारी नमक, समुद्र नमक, मिनहारी नमक, प्रत्येक एक-एक तोला । पीपलामूल, चित्रक, दारचीनी, पीपल, इमली की छाल, जीरा दो-दो तोले । धनिया, अमलवेत, सोंठ, बड़ी इलायची के दाने, छोटा बेर, अजमोद, नागरमोथा तीन-तीन तोला । सब का चौथाई अनारदाना, और फिर सबकी आधी मिश्री । यह महाखाण्डव चूर्ण हुआ । इससे अरुचि, मन्दानि, हृदयरोग, खाँसी, अतिसार, कण्ट रोग, उदर रोग, मुख रोग, हैजा अफारा, ववासीर, गोला कुमि, तथा वमन आराम होता है ।
९ नारायण चूर्ण—चीते की छाल, हरड, बहेड़ा, श्रांवला, सोंठ, मिरच, पीपल, जीरा, दारुबेर, बच, अजवाहन, पीपलामूल, सोंफ, वन तुलसी, अजमोद, कचूर, धनिया, वायविडंग, मगरेल, पौकर मूल, सज्जी, जवाखार, संधानमक, कालानमक, १०
सुगम आकाश
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नमक,समुद्रनमक, मनिहारी नमक, कूट ये सब एक-एक तोला । इन्द्रायण की जड़ दो तोला,निसोथ तीन तोला,दन्ती तीन तोला,पीली थूहर चार तोला, सबको कूट-पीस कर चूर्ण बनाये । मात्रा चार माशा । इसे हृदय रोग, पाण्डुरोग, खाँसी,श्वास,भगंदर, मन्दाग्नि, ज्वर, कोद, संग्रहणी, में शराब के संग दे । पेट फूलने पर सिरके के साथ दे, गुलम रोग, उदर रोग, अजीर्ण आदि को उप- युक्त अनुपान से दे तो सब रोगों का प्रशमन करे ।
१० पंचसम चूर्ण—सौठ, हरड, पीपल, निसोथ, कालानमक, सब बराबर ले बारिक पीस चूर्ण करे । यह शूल, पेट का फूलना मन्दाग्नि, बवासीर, और आमवात को नष्ट करेगा ।
११ सितोपलादि—मिश्री सोलह तोला, वंशलोचन आठ तोला, पीपल चार तोला,छोटी इलायची के बीज दो तोला, दालचीनी एक तोला, सबको कूट-पीस कर घी और शहद के साथ सेवन करे, तो श्वास, खाँसी, क्षय, हाथ-पैरों का दाह, मन्दाग्नि, जीभ की शून्यता, पसली का दर्द, अरुचि, ज्वर, अर्द्धगत, रक्तपित्त सब दूर हो ।
१२ लवणमास्कर—पांचोनमक, धनिया, पीपल, पीपलामूल, कालाजीरा, पत्रज, नागकेशर, तालीस पत्र, और अमलवेत ये दस दवाइयां दो दो तोला । काली मिर्च, जीरा, सौठ एक-एक तोला । अनारदाना चार तोला,दारचीनी और इलायची छे-छे माशे । सबको कूट छान कर चूर्ण करे । इसे दही के पानी या दही की मलाई से अथवा छाछ या शराब के साथ चार माशा ले, तो उदर गोला,