सुगम चिकित्सा
Sugam Chikitsa
आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा
स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)
पृष्ठ 184, कुल 222 में से
संदर्भ में पढ़ेंफूंकने से मएडूर भस्म होजाती है। जो गुण लोहे के हैं वही मएडूर के हैं। इसकी मात्रा १॥ माशे तक है।
भस्म के लिए काला अम्रक लेना चाहिए। पहले काला अम्रक आँच में लाल करके दूध में बुझाना, फिर तपक अलग-अलग कर
चौलाई के रस या किसी खट्टे रस में आठ पहर अम्रक भस्म
भावना देना। इससे अम्रक शुद्ध होता है। शुद्ध
अम्रक चार भाग और चावल का धान एक भाग कमल में एक साथ बाँधकर तीन दिन पानी में भिगो रखना, फिर हाथ से मलकर जब छोटे-छोटे बालू के कण के समान होजाय तब उसकी भस्म करना। इसे धान्याम्र कहते हैं। धान्याम्र को गोमूत्र में घोट कर गजपुट में फूंकने से अम्रकभस्म तैयार होती है। जबतक अम्रक में चमक रहे तबतक वरावर पुट देते रहना चाहिए। हजार पुटी अम्रक उत्तम होता है।
अम्रक भस्म सवा सेर, त्रिफला का काढ़ा दो सेर, गाय का घी एक सेर, सबको इकट्ठा लोहे की कढ़ाई में धीमी आँच पर चढ़ाना, जब सब जल जाय तब छानकर रखना। अम्रक भस्म की मात्रा दो से छः रत्ती तक है।
तीन भाग सोना माखी, एक भाग संधा नमक, बड़े नीवू के रस में, घोटकर लोहे की कढ़ाई में पकाना, और बारबार चलाते
सोना माखी
रहना। जब लोहपात्र लाल हो जाय तो सम-भत्ता कि स्वर्णमादिक शुद्ध होगया। वही स्वर्ण-
मादिक कुल्थी के काढ़े में या तिल के तेल में अथवा मट्टा या चकरी