सुगम चिकित्सा
Sugam Chikitsa
आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा
स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)
पृष्ठ 185, कुल 222 में से
संदर्भ में पढ़ेंभुतमात्राशक्त्या
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के दूध में, मर्दन कर गजपुट में फूंकना । इसी भाँति शीघ मादिक मेदगृह्णी और घड़े नीवू के रस में भिगोकर तेज घूष में रखने से शुद्ध होता है ।
सोनामाखी की भस्म हल्की, रसायन, नेत्रों को हितकारी, कोद, सूफन, श्वासीर, प्रमेह, पाण्डु, सोना माखी का गुण कुष्ठ और श्वासीर तथा क्षय को लाभदायक है । इसकी मात्रा छः रत्ती तक है ।
शरुद्ध स्वर्ण माखी—अन्ध कर देती है । कोद और क्षय पैदा करती है । इससे भलीभाँति शोध कर काम में लेना चाहिए ।
तृतिया शोधन—घड़े नीवू के रस में खरल कर सवा सेर उपलों की आँच देने से, फिर तीन दिन दही के पानी की भावना देने से तृतिया शुद्ध होता है । यह नेत्र रोग और विपनाशक है । तथा वमन कारक है ।
गोमूत्र की तरह गन्धवाला, काला रंग वाला, कड़वा, कसैला, शीतल, चिकना, भारी शिलाजीत होता है । पहले उसे गर्म पानी में भिगोकर रखना, फिर कपड़े से एक मिट्टी के शिलाजीत शोधन वर्तन में छानकर दिन-भर घूष में रखना । शाम को पानी के ऊपर की मलाई वर्तन में निकालना । इसी तरह रोख घूष में रखकर मलाई लेना । यही मलाई शोधित शिलाजीत है । असली शिलाजीत आग में देने से लिङ्ग की भाँति ऊपर को उठता है और धुँआ नहीं देता ।
प्रमेह नाशक, गर्म, रसायन, उन्माद, सूजन, क्षय कोद, पथरी,