सुगम चिकित्सा
Sugam Chikitsa
आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा
स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)
फूंकने से मएडूर भस्म होजाती है। जो गुण लोहे के हैं वही मएडूर के हैं। इसकी मात्रा १॥ माशे तक है।
भस्म के लिए काला अम्रक लेना चाहिए। पहले काला अम्रक आँच में लाल करके दूध में बुझाना, फिर तपक अलग-अलग कर
चौलाई के रस या किसी खट्टे रस में आठ पहर अम्रक भस्म
भावना देना। इससे अम्रक शुद्ध होता है। शुद्ध
अम्रक चार भाग और चावल का धान एक भाग कमल में एक साथ बाँधकर तीन दिन पानी में भिगो रखना, फिर हाथ से मलकर जब छोटे-छोटे बालू के कण के समान होजाय तब उसकी भस्म करना। इसे धान्याम्र कहते हैं। धान्याम्र को गोमूत्र में घोट कर गजपुट में फूंकने से अम्रकभस्म तैयार होती है। जबतक अम्रक में चमक रहे तबतक वरावर पुट देते रहना चाहिए। हजार पुटी अम्रक उत्तम होता है।
अम्रक भस्म सवा सेर, त्रिफला का काढ़ा दो सेर, गाय का घी एक सेर, सबको इकट्ठा लोहे की कढ़ाई में धीमी आँच पर चढ़ाना, जब सब जल जाय तब छानकर रखना। अम्रक भस्म की मात्रा दो से छः रत्ती तक है।
तीन भाग सोना माखी, एक भाग संधा नमक, बड़े नीवू के रस में, घोटकर लोहे की कढ़ाई में पकाना, और बारबार चलाते
सोना माखी
रहना। जब लोहपात्र लाल हो जाय तो सम-भत्ता कि स्वर्णमादिक शुद्ध होगया। वही स्वर्ण-
मादिक कुल्थी के काढ़े में या तिल के तेल में अथवा मट्टा या चकरी
भुतमात्राशक्त्या
८
के दूध में, मर्दन कर गजपुट में फूंकना । इसी भाँति शीघ मादिक मेदगृह्णी और घड़े नीवू के रस में भिगोकर तेज घूष में रखने से शुद्ध होता है ।
सोनामाखी की भस्म हल्की, रसायन, नेत्रों को हितकारी, कोद, सूफन, श्वासीर, प्रमेह, पाण्डु, सोना माखी का गुण कुष्ठ और श्वासीर तथा क्षय को लाभदायक है । इसकी मात्रा छः रत्ती तक है ।
शरुद्ध स्वर्ण माखी—अन्ध कर देती है । कोद और क्षय पैदा करती है । इससे भलीभाँति शोध कर काम में लेना चाहिए ।
तृतिया शोधन—घड़े नीवू के रस में खरल कर सवा सेर उपलों की आँच देने से, फिर तीन दिन दही के पानी की भावना देने से तृतिया शुद्ध होता है । यह नेत्र रोग और विपनाशक है । तथा वमन कारक है ।
गोमूत्र की तरह गन्धवाला, काला रंग वाला, कड़वा, कसैला, शीतल, चिकना, भारी शिलाजीत होता है । पहले उसे गर्म पानी में भिगोकर रखना, फिर कपड़े से एक मिट्टी के शिलाजीत शोधन वर्तन में छानकर दिन-भर घूष में रखना । शाम को पानी के ऊपर की मलाई वर्तन में निकालना । इसी तरह रोख घूष में रखकर मलाई लेना । यही मलाई शोधित शिलाजीत है । असली शिलाजीत आग में देने से लिङ्ग की भाँति ऊपर को उठता है और धुँआ नहीं देता ।
प्रमेह नाशक, गर्म, रसायन, उन्माद, सूजन, क्षय कोद, पथरी,
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धातुओं की भस्म
शोथ, उदर, अपस्कार, वस्तीरोग ववासीर, शिलाजीत के गुण खाँसी, श्वास, और पेशाब के रोगों को फायदा करता है। इसकी मात्रा चार रत्ती से १॥ मासों तक है।
रसौत—रसौत को बड़े नीबू के रस में मिलाकर दिन-भर धूप में रखने से अथवा पानी मिलाकर छान लेने से शोथित होता है।
सिन्दूर—दूध या किसी खट्टे रस की भावना देने से सिन्दूर शुद्ध होता है।
सुहागा—आग पर रखकर खील करने से शुद्ध होता है।
शङ्खादि—शङ्ख सीप, और कौड़ी कौजी में एक पहर दौला-यन्त्र में औटाने से शुद्ध होता है। और कुल्हड़ में रखकर आग में जलाने से भस्म होजाता है।
समुद्रफेन—कागजी नीबू के रस में पीसने से समुद्रफेन शुद्ध होजाता है।
गेरु—गाय के दूध में घिसने या गाय के घी में भूलने से गेरु शुद्ध होता है।
हीराकस—भङ्गुरैया के रस में एक दिन भिगोने से हीराकस शुद्ध होता है।
सात दिन दौलायन्त्रमें गोमूत्र के साथ औटाने से खपरिया शुद्ध होता है। फिर आगपर चढ़ाकर, गल जाने पर
खर्प
क्रमशः संधा नमक डालते हुए ढाक की लकड़ी से चलाते जाना। राख की तरह हो जाने पर नीचे उतार लेने से खर्प तैयार होता है।
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मीठाविष—या मीठा तेलिया, छोटे-छोटे टुकड़े करके, तीन दिन गोमूत्र में भिगोने से शुद्ध होता है। गोमूत्र रोज़ बदलना चाहिए। फिर उसकी छाल निकाल डालना।
जमालगोटा—जमालगोटे के बीज के बीच में जो जीभ होती है उसे निकालकर, दौलायन्त्र में दूध के साथ औटाने से वह शुद्ध होता है।
धतूरे का बीज—कूटकर गोमूत्र में चार पहर भिगो रखने से धतूरे के बीज शुद्ध होते हैं।
अफ्रीम—अदरख के रस की बारह भावना देने से अफ्रीम शुद्ध होती है।
भाँग—पानी से धोकर सुखा लेने से भाँग शुद्ध होती है।
कुचला—घी में भूनने से कुचला शुद्ध होता है।
एक हाँड़ी में थोड़ा गोबर रखकर उसपर एक पान रखकर गोदन्ती हरताल गोदन्त रखना और हाँड़ी का मुँह बाँधकर कपड़ा और मिट्टी का लेपकर चार पहर आग में रखने से गोदन्त ऊपर लग जायगा। वही शुद्ध गोदन्ती है। सब काम में लेना।
भिलावा—पक्का भिलावा जो पानी में डूब जाय लेकर ईंट के चूर्ण में घिसने से शुद्ध होता है।
हींग—लोहे की कढ़ाई में थोड़े घी में भूनने से लाल होनेपर हींग शुद्ध होता है।
नौसादर—चने के पानी में दौलायन्त्र में औटाने से नौसादर शुद्ध होती है। या गर्म पानी में खरल कर मोटे कपड़े से छान कर
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धातुओं की भस्म
पानी में एक वर्तन में रखना, छण्डा होने पर नीचे जो पदार्थ जम जाय वही शुद्ध नौसादर है।
गन्धक शोधन—लोहे की कट्वाई में थोड़ा घी गरम कर, उसमें गन्धक चूर्ण डालना। गन्धक गल जाने पर पानी मिलाए दूध में डालना, इसी तरह सब गन्धक गल जाने पर पानी मिलाए दूध में डालना, फिर अच्छी तरह धोकर काम में लेना।
हरताल—तबक़ी हरताल पहले सफेद कोहड़े के रस में, फिर चूने के पानी और तेल में। एक-एक बार दौलायन्त्र में औटाने से हरताल शुद्ध होता है।
हरताल भस्म—एक पका हुआ काशीफल लेकर हरताल की शुद्ध हली को चूने में लपेटकर उसमें रख कपरोटी कर गजपुट की आँच दे तो हरताल भस्म हो। यह हरताल भस्म कोढ़, आतशक, और रक्त-विकार की उत्तम दवा है। मात्रा दो से छः रत्ती तक है।
हिंगुल शोधन—हिंगुल को नीवू के रस और भेड़ के दूध में सात-सात भावना देने से हिंगुल शुद्ध होता है। भेड़ का दूध न मिले तो भैंस के दूध ही से सात भावनाएँ देनी चाहिए। इससे हिंगुल शुद्ध होता है।
हिंगुल से जो पारा निकाला जाता है, उसकी विधि यह है कि हिंगुल को चूरा करके एक मोटे कपड़े में पोटली बाँधें। उसपर
हिंगुल के बराबर वजन का कपड़ा लपेट दो। यह गोला एक चौड़े मुंह की हाँडीमें रखकर उसपर दूसरी हाँडी रखो, बीच में कोई चीज अट-
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कादो, जिससे उसका मुँह कुछ खुला रहे, और गोले में आँच लगादो। ठण्डा होने पर दोनों हाँडियों में से पारा इकट्ठा करके कपड़े में छान लो। यह पारा शुद्ध होता है।
कज्जली—शुद्ध पारा और शुद्ध गन्धक बराबर लेकर उस समय तक खरल किया जाय जबतक कि दोनों मिलकर काजल की तरह काले न हो जायँ और चमक न जाती रहे। कहीं-कहीं दूना गन्धक मिलाकर कज्जली बनाते हैं।
पारा और गन्धक की कज्जली कपरीटी की हुई आतशी शीशी में भरकर एक हाँडी में अठन्नी के बराबर पेंदी में छेद कर,
रस सिन्दूर उसपर अम्भक का एक टुकड़ा रख, उसपर शीशी टिकाकर हाँडी को रेत से गले तक भरदे।
फिर उसे चूल्हे पर चढ़ाकर पहले हल्की फिर तेज़ आँच क्रमशः दे। बोटल से पहले नीले रङ्ग का धुँआ निकलेगा। फिर धुँआ बन्द होकर जब आँच निकलने लगे तब आग बुझा दे और ठण्डा होने पर बोटल तोड़ कर ऊपर के भाग में लगे हुए रस सिन्दूर को निकाल ले।
पारा गन्धक की कज्जली में एक भाग सोने का पत्तर डाल कर भलीभाँति धीग्वार के रस में घोटे। फिर चन्द्रोदय रस सिन्दूर की भाँति पाक करे तो चन्द्रोदय सिद्ध हो। इसकी मात्रा एक चावल है। और विशेष अनुपान से सब रोगों में काम में आता है।
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काम के शास्त्रीय नुसखे
काढ़े
१ गुड्ड्यादि काढ़ा—गिलोय, धनिया, नीमकी छाल, पद्मराख, लालचन्दन, इन चीजों के काढ़े को गुड्ड्यादि कहा गया है। इसमें मधु प्रकार के नये ज्वर, नये दाह, वमन, अरुचि दूर होती है। अग्नि चैतन्य होती है।
२ लुद्रादि काढ़ा—कटेहली, चिरायता, कुटकी, साँठ, गिलोय, और थरंड की जड़। इन छः दवाइयों का काढ़ा पीने से मधु प्रकार का ज्वर जिसमें ग्वाँसी, आस तथा कन्ड भी हैं, आराम होता है।
३ लघुलुद्रादि काढ़ा—कटेहली, साँठ, गिलोय, और थरंडी की जड़, इन चार दवाइयों का काढ़ा पीने से प्रचल कफ वायु ग्वाँसी माँस, अरुचि पीठ या छाती का दर्द वाला ज्वर भी आराम होता है।
४ दशमूल काढ़ा—शालपर्णी, पृष्ठिपर्णी, छोटी कटेहरी, बड़ी कटेहरी, गोखरू, बेलगिरी, थरन्जी, स्योनाक, कम्भारी, पाहुल, इन दस चीजों का काढ़ा पीने से वात, कफ का ज्वर, न्युमोनिया, प्रगृति ज्वर, मल्लिपात ज्वर दूर होता है। इस काढ़े में पीपल का चूर्ण डालना चाहिए।
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५ अष्टादशाङ्गकाढ़ा—दशमूल, चिरायता, कुटकी, नागरमोथा, धनिया, इन्द्र जौं, सांठ, देवदारु, और गजपीपल, इन अठारह दवाइयों का काढ़ा सब प्रकार के सन्निपात ज्वरों तथा निमोनिया में अत्यन्त लाभदायक है।
६ देवदावादि काढ़ा—देवदारु, वच, कूठ, पीपल, सांठ, कायफल, नागरमोथा, चिरायता, कुटकी, धनिया, बड़ी हरड, गजपीपल, धमासा, गोखरू, कटेहली, अतीस, गिलोय, काकड़ासौंगी, काला जीरा, लाल धमासा, इन बीस दवाइयों का काढ़ा पीने से प्रसूति, रोग, शूल, खाँसी, ज्वर, मूछा, खास, कफ वायु, और मस्तक पीड़ा दूर होती है।
७ धान्य पंचक—धानिया, नेत्रवला, चेलगिरी, नागरमोथा, और सांठ, इनका काढ़ा पेट की आँच को निकालता है। तथा दीपन पाचन करता है।
८ धातक्यादि काढ़ा—धाय के फूल, चेलगिरी, लोध, नेत्रवला और गजपीपल का काढ़ा शीतल करके तथा शहद मिलाकर पिलाने से बच्चों को हरे-पीले दस्तों में बहुत फायदा होता है।
९ पुनर्नवादि काढ़ा—साँठ की जड़, हरड, नीम की छाल, दारु हल्दी, कुटकी, पटोल पत्र, गिलोय, और सांठ, इन का काढ़ा गोमूत्र में मिलाकर पीने से पाण्डुरोग, खाँसी, पेट की बीमारियाँ, खास और शूल तथा सर्वाङ्ग की सूजन दूर होती है।
१० कटेहली का काढ़ा—कटेहली के काढ़े में पीपल का चूर्ण पीने से खाँसी तुरन्त दूर होती है।
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काम के शास्त्रीय नुसख
११ रास्तादि काढ़ा—रास्ता, गिलोय, देवदारु, सोंठ, और अरण्ड की जड़ का काढ़ा पीने से वायु की सब बीमारियाँ दूर होती हैं।
१२ मंजिष्ठादि काढ़ा—मजीठ, हरड, बहेड़ा, आँवला, कुटकी, बच, दारुहल्दी, गिलोय, नीम की छाल, इन नौ दवाइयों का काढ़ा बात रक्त, खाज, फोड़ा-फुंसी, कोढ़ और सब प्रकार के रक्त विकार में फायदेमन्द है।
चूर्ण
१ त्रिफला चूर्ण—हरड, बहेड़ा, आँवला, बराबर चूर्ण करके फंकी लेने से प्रमेह, सूक्ष्म, विषम स्वर, कफ, पित्त, और कुछ आराम होता है। त्रिफला का चूर्ण विषम मात्रा में धी और शहद के साथ लेने से सब प्रकार की आँखों की बीमारी आराम होती है।
२ त्रिकुटा चूर्ण—सोंठ, मिर्च काली, पीपल, तीनों का चूर्ण अधिक वर्धक, कफ, चर्बी, कोढ़, जुकाम, अरुचि, आसदोष प्रमेह, वायु गोला, और गले की बीमारियों को आराम करता है।
३ सुदर्शन चूर्ण—हरड, बहेड़ा, आँवला, हल्दी, दारुहल्दी, छोटी कटेहली, बड़ी कटेहली, कचूर, सोंठ, मिरच, पीपल, पीपरा मूल मूर्वा, गिलोय, धमासा, कुटकी, पित्तपापड़ा, नागरमोथा, चायमाण, नेत्रवाला, नीम की छाल, पोहकरमूल, सुलहटी, कुडे की छाल, अजवायन, इन्द्रजौ, भारंगी, संहजने के वीज, फिटकरी, बच, दारचीनी, पद्मसाख, चन्दन, अतीस, खरेटी, शालपर्णी, पुष्ट
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पर्णी, सतावर, असगन्ध, लौंग, वंशलोचन, कमलगद्गा, विदारी-बांद, पत्रज, जावन्नी, तालीसपत्र इन सब के वजन से आधा चिरायता डाल चूर्ण करले। यह सुदर्शन चूर्ण है। इसे ताजा पानी से सेवन करने से वात पित्त, कफ हृद, सन्निपात के ज्वर, विषम ज्वर, आगन्तुक ज्वर, धातु जन्य ज्वर, मानस ज्वर, इत्यादि सम्पूर्ण ज्वर, शीत ज्वर, एकादिक, आदि ज्वर, मोह, तन्त्रा, भ्रम, चूपा, भ्रास, खौंसी, पाण्डु, हृदय रोग, कामला, शूल आदि सब दूर होते हैं।
४ हरीतक्यादि चूर्ण—काला नमक, बड़ी हरड, काली मिर्च, सोठ, चारों बराबर ले इन्हें अलग-अलग (नमक के सिवा) घी में भून कर चूर्ण कर छः-छः मास की मात्रा में दिन में तीन बार दही के साथ खाने से तथा खिचड़ी-दही पथ्य लेने से पेंचिस को आराम होजाता है।
५ गंगाधर चूर्ण—नागरमोथा, इन्द्र जौ, बेलगिरी, पठानी-लोध, मोचरस और धाय के फूल, इनका चूर्ण करके छाछ में गुड़ मिलाकर उसके साथ चूर्ण को पीवे तो सब प्रकार का अतिसार आराम हो।
६ लवंगदि चूर्ण—लौंग, कपूर, इलायची, दालचीनी, नाग-केसर, जायफल, खस, सोठ, काला जीरा, अगर, वंशलोचन, जटामांसी, नीला कमल, पीपल, सफेद चन्दन, तगर, नेत्रवाला और ककोल, इनका चूर्ण कर, चूर्ण से आधी मिश्री मिला, उपयुक्त मात्रा में सेवन करे। इससे भ्रमिन् प्रदीप होती है, रुचिकारक है, पुष्टिकारी है, वात, पित्त, कफ को शमन करता है। हृदय रोग,
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काम के शास्त्राय नुसख
कण्ट रोग, खांसी, हिचकी, पीनस, तथ, श्वास, अतिसार, अरुचि, संग्रहणी, प्रमेह सबको लाभदायक हैं ।
७ जालीफलादि चूर्ण—जायफल, लोंग, इलायची, तमालपत्र, दालचीनी, नागकेसर, कपूर, सफेद चन्दन, कालितिल, वंशलोचन, तगर, श्रांवला, तालीस पत्र, पीपल, हरड, कालाजीरा, चीते की छाल, सोंठ, वायविडंग और काली मिर्च सब बराबर और सबके बराबर भाँग, और फिर सबके बराबर मिश्री । मात्रा एक तोला शहद के साथ । संग्रहणी, खांसी, श्वास, अरुचि, क्षय, वायु, कक का विकार और पीनस आराम होती है ।
८ महाखाण्डव चूर्ण—काली मिर्च, नाग केसर, तालीस, सेधा-नमक, काला नमक, खारी नमक, समुद्र नमक, मिनहारी नमक, प्रत्येक एक-एक तोला । पीपलामूल, चित्रक, दारचीनी, पीपल, इमली की छाल, जीरा दो-दो तोले । धनिया, अमलवेत, सोंठ, बड़ी इलायची के दाने, छोटा बेर, अजमोद, नागरमोथा तीन-तीन तोला । सब का चौथाई अनारदाना, और फिर सबकी आधी मिश्री । यह महाखाण्डव चूर्ण हुआ । इससे अरुचि, मन्दानि, हृदयरोग, खाँसी, अतिसार, कण्ट रोग, उदर रोग, मुख रोग, हैजा अफारा, ववासीर, गोला कुमि, तथा वमन आराम होता है ।
९ नारायण चूर्ण—चीते की छाल, हरड, बहेड़ा, श्रांवला, सोंठ, मिरच, पीपल, जीरा, दारुबेर, बच, अजवाहन, पीपलामूल, सोंफ, वन तुलसी, अजमोद, कचूर, धनिया, वायविडंग, मगरेल, पौकर मूल, सज्जी, जवाखार, संधानमक, कालानमक, १०
सुगम आकाश
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नमक,समुद्रनमक, मनिहारी नमक, कूट ये सब एक-एक तोला । इन्द्रायण की जड़ दो तोला,निसोथ तीन तोला,दन्ती तीन तोला,पीली थूहर चार तोला, सबको कूट-पीस कर चूर्ण बनाये । मात्रा चार माशा । इसे हृदय रोग, पाण्डुरोग, खाँसी,श्वास,भगंदर, मन्दाग्नि, ज्वर, कोद, संग्रहणी, में शराब के संग दे । पेट फूलने पर सिरके के साथ दे, गुलम रोग, उदर रोग, अजीर्ण आदि को उप- युक्त अनुपान से दे तो सब रोगों का प्रशमन करे ।
१० पंचसम चूर्ण—सौठ, हरड, पीपल, निसोथ, कालानमक, सब बराबर ले बारिक पीस चूर्ण करे । यह शूल, पेट का फूलना मन्दाग्नि, बवासीर, और आमवात को नष्ट करेगा ।
११ सितोपलादि—मिश्री सोलह तोला, वंशलोचन आठ तोला, पीपल चार तोला,छोटी इलायची के बीज दो तोला, दालचीनी एक तोला, सबको कूट-पीस कर घी और शहद के साथ सेवन करे, तो श्वास, खाँसी, क्षय, हाथ-पैरों का दाह, मन्दाग्नि, जीभ की शून्यता, पसली का दर्द, अरुचि, ज्वर, अर्द्धगत, रक्तपित्त सब दूर हो ।
१२ लवणमास्कर—पांचोनमक, धनिया, पीपल, पीपलामूल, कालाजीरा, पत्रज, नागकेशर, तालीस पत्र, और अमलवेत ये दस दवाइयां दो दो तोला । काली मिर्च, जीरा, सौठ एक-एक तोला । अनारदाना चार तोला,दारचीनी और इलायची छे-छे माशे । सबको कूट छान कर चूर्ण करे । इसे दही के पानी या दही की मलाई से अथवा छाछ या शराब के साथ चार माशा ले, तो उदर गोला,
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तिल्ली, चूय, बवासीर, संग्रहणी, कोढ़, बद्धकाष्टता, भगंदर, सूक्ष्म, शूल, श्वास, खांसी, आमपात, मन्दाग्नि ये सब रोग दूर हों।
१३ एलादि चूर्ण—छोटी इलायची के दाने, फूलप्रियंगु, नागरमोथा, बेर की गुठली, पीपल, सफेद चन्दन, खील, लोंग, नागकंसर इन नौ दवाइयों का चूर्ण शहद और मिश्री मिला कर चाटने से उल्टी होने को रोकता है।
१४ शतावर चूर्ण—शतावर, गोखरू, कांच के बीज, गंगेदहन, खरेटी, तालमखाना, इनका चूर्ण रात को गाय के दूध के साथ फँकी करने से वीर्य पुष्ट होता है, और काम शक्ति बढ़ती है।
गोलीं
१ संजीवनी वटी—शायबिंडंग, सोठ, पीपल, बड़ी हरड, झाँवला, यहेंडा, वच, गिलौय, भिलावे, मीठापि, सब बराबर लेकर गाय के मूत्र में पीस कर एक-एक रत्ती की गोली बनाये। यह गोली एक अजीर्ण में अदरख के रस में, हँजे में दो गोली और साँप के विष पर तीन तथा सन्निपात में चार गोली खाय।
२ कोशापिवटी—सोठ, मिरच, पीपल, अमलवैत, चक, तालीसपत्र, चिमक, जीरा, इमली की छाल, ये नौ दवाइयों एक-एक तोला। दालचीनी, इलायची, पमज आठ-आठ माशा, पुराना गुड़ बीस तोला मिलाकर गोली बना काम में ले। यह गोली पीनस, जुकाम, खाँसी, सांस, इन रोगों को दूर कर रुचि उत्पन्न करे और आवाज को शुद्ध करे।
सुगम चिकित्सा
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३ सरण वटी—सूखा जमीकन्द दो तोला, चीते की छाल सोलह तोला, सोठ चार तोला, काली मिरच दो तोला, लेकर सबको कूट पीसकर चूर्ण करे, चूर्ण के बराबर गुड़ मिलाकर गोली बनावे, यह बवासीर की अच्छी दवा है। सब प्रकार की बवासीर को आराम करती है।
४ चन्द्रप्रभा वटी—कचूर, कच, नागरमोथा, चिरायता, गिलोय, देवदारु, हल्दी, अतीस, दारु हल्दी, पीपरामूल, चीते की छाल, धनिया, हरड, बहेड़ा, आँवला, चन्य, वायविङ्ग, राज पीपल, सोठ, काली मिरच, पीपल, स्वर्ण मालिक भस्म, सज्जी, जवाखार, सेधा नमक, काला नमक, विङ्ग नमक, ये २७ दवाइयाँ चार-चार माशा। निसोत, दन्ती, तमाल पत्र, दालचीनी, इलायची दाना, वंशलोचन, ये छः दवा सोलह-सोलह माशा। लोह भस्म दो तोला, मिश्री चार तोला, शिलाजीत आठ तोला, गुगल आठ तोला, इन सबको एकत्र कूट पीसकर एक जीव करके बेर के समान गोली बनावे। यह सब रोगों पर चलती है। प्रमेह, मूत्र कृच्छ्र, मूत्राघात, पथरी, कण्ड, पेट फूलना, शूल, प्रमेह, अपेडकोप की वृद्धि, पाँडू रोग, कामला, हलीमक, कमर पीड़ा, साँस, खांसी, कोढ़, बवासीर, खाज, तिल्ली, भगंदर, दांत के रोग, नेत्र रोग, खियों के रजोधर्म-सम्बन्धी रोग, पुरुषों के वीर्य विकार, मन्दान्न, अरुचि, आदि आराम होते हैं।
५ योगराज गुगल—सोठ, मिरच, पीपल, चन्य, पीपल मूल, चीते की छाल, भुनी हींग, अजमोद, सरसों, जीरा, काला जीरा,
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काम के शास्त्रीय नुसखे
रेणुका, इन्द्रजौ, वाद, वायविडङ्ग, गजपीपल, कुटकी, अतीत, भारंगी, वच, मूर्ची, जवासा चार-चार माशा । सबसे दूना त्रिफला सबको कूट चूर्ण कर, सब चूर्ण के बराबर शुद्ध गुगल सबको खरल में डालकर खूब चारीक पीस गुड़ के समान पाककर मिलावे, फिर वंग, चांदी भस्म, नागेश्वर, लोहसार, अम्रक, मण्डूर और रस सिन्दूर प्रत्येक चार-चार ताला लेकर गूगल में डाले, और अच्छी तरह कूटे । घी का हाथ लगाता जाय, फिर चार-चार माशे की गोली बनावे । यह गूगल त्रिदोष नाशक और रसायन है । बिना पथ्य के भी गुण करता है । इससे सम्पूर्ण वायुरोग, कोढ़, ववासीर, संग्रहणी, प्रमेह, वातरक्त, नाभिशूल, भगन्दर, उदावर्त क्षय, गुल्म, भृगी, उरोग्रह, मन्दाग्नि, खांसी, खास, अरुचि ये सब रोग नष्ट होते हैं । धातु विकार को दूर करता है । और स्त्रियों के रजोदर्शन सम्बन्धी स्नेगों को दूर करता है । पुरुषों की धातु वृद्धि करके उन्हें पुत्र देता है । वॉम्फ स्त्रियों को गर्भ देता है । रास्तादि काढ़े के साथ सेवन करने से समस्त वात रोग को दूर करता है । दारुहल्दी के काढ़े के साथ प्रमेह को दूर करता है । गो-मूत्र के साथ सेवन करने से पाण्डु रोग को आराम करता है । शहद के साथ सेवन करने से मेंदुरोग को गुण करता है । नीम की छाल के काढ़े में कुछ को फायदा करता है । वातरक्त रोग में गिलोय के काढ़े के साथ खाय । शूल और सूजन में पीपल के काढ़े से सेवन करे । वातरक्त में गिलोय के काढ़े से खाय । नेत्ररोग में त्रिफला के काढ़े के साथ सेवन करे । उदररोग में पुनर्नवादि काढ़े के साथ
सुगम चिकित्सा
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खाय। नेत्ररोग में त्रिफला के काढ़े से सेवन करे। इसी प्रकार अपनी बुद्धि से भिन्न-भिन्न रोगों पर इसे देना चाहिए।
६ गोल्डरादि गुगल—११२ तोला गोखरू जौकूट करके छः गुने पानी में चढ़ाकर आधा शेष रहने पर उतारले, तब शुद्ध गूगल २८ तोला अच्छी तरह कूटकर उसमें मिला दे। फिर उसका गुड़ के समान पाक करे। गाढ़ा होने पर ये दवाइयाँ मिलावें। सोंठ, मिरच, पीपल, हरड, बहेड़ा, आँवला, नागरमोथा चार-चार तोला। बाद में कूटकर भरबेर के समान गोली बनाले। इसके सेवन करने से पेशाब रुकना, पथरी की बीमारी, मूत्रकृच्छ्र, प्रदर रोग, सूत्राधात, वातरक्त, वादी के रोग, धातु विकार आदि आराम होते हैं।
७ काँचना गुगल—कचनार की छाल ४० तोला, हरड, बहेड़ा, आँवला, आठ-आठ तोला, वरना चार तोला, इलायची, दारचीनी, तमालपत्र एक-एक तोला लेना। फिर सब को कूट-छानकर चार-चार मास की गोली बनाना। मुण्डी या खैरसार के काढ़े में प्रातः काल खाने से कण्ठ माला में बहुत फायदा करती है। अपची, अर्घुद्ध गाँठ, गोला, भगन्दर, आदि रोग भी इससे दूर होते हैं।
अवलहे
१ न्यवन प्राश—पाठा, अरनी, काश्मरी, चेले की छाल, स्योना पाठा, गोखरू, शालपर्णी, प्रष्टिपर्णी, दोनों कटेहली, तीनों पीपल, काकड़ासीगी, दाख, गिलोय, हरड खरेटी, भूमि आँवला, अदूसा, असगन्ध, सतावर, कचूर, जीवक, ऋपभक, नागरमोथा,
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काम के शास्त्रीय नुसखे
पोकरमूल, कौवाडोंडी, मूगपर्णी, मापपर्णी, विद्यारीकन्द, साठ की जड़, कमल मेदा, महामेदा, छोटी इलायची, अगर, चन्दन, प्रत्येक चार-चार तोला । इन्हें थोड़ा कूटकर रखले । फिर बड़े-बड़े आँवले ५००, बड़े मटके में पोटली बाँध, डालकर उसमें १०२४ तोला पानी में दवा डालकर पकाओ । जब दवा का रस पानी में आजाय और आँवला गल जाय तब पोटली से आँवला निकालकर गुठली दूर करके कपड़े में रगड़ कर छान ले । फिर उसे २८ तोला मीठे तेल में बाद में उतने ही घी में भूने । जब पानी का अंश न रहे तब उतारे । अब काढ़े में तीन सेर खाँड़ डालकर चाशनी करे । जब दो तार की चाशनी होजाय तब उसमें उपरोक्त आँवला डाल कर पकावे । जब दीवले पड़ने लगे तब उतार ले । ठण्डा होने पर नीचे लिखी दवाइयाँ मिलादे । पीपल आठ तोला, वंशलोचन सोलह तोला, दारचीनी, इलायची, तेजपात नौ-नौ माशा । शहद चौबीस तोला । बस च्यवनप्राश तैयार है । क्षीण पुरुष को मोटा-ताजा बनाने में अपूर्व है । यह अबलेह बालक, वृद्ध, जख्मी, नपुंसक, शोपरोगी, हृद्दोगी, और स्वर क्षीण को लाभकारी है । खास, कास, प्यास, चातरक्त, उरोग्रह, वीर्य दोष, मूत्र दोष, सब को दूर करता है । इसके प्रयोग से बुद्धि स्मरण-शक्ति, रमण-शक्ति, शरीर कान्ति और वर्ण प्राप्त होता है । अजीर्ण का नाश होता है ।
२ मूसलीपाक—मूसली सफेद का चूर्ण बीस तोला । गाय का दूध चार सेर । दोनों को पकाकर मावा करे, फिर आध सेर ताजे घी में भूने । इसके बाद छेड़ सेर खाँड़ की चाशनी कर उसमें मिलादे ।
सुगम चिकित्सा
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साथ ही नीचे लिखी दवाइयों कूटकर कपडछान कर डालदे । गोद बवूल बत्तीस माशा, बादाम की मींग बत्तीस माशा, गोला कतरा हुआ बत्तीस माशा, जायफल, जावत्री, लौंग, केसर, चाव, डेवर, बालछड़, कोंच के बीज, तज, पत्रज, सफेद इलायची, नाग- केसर, मिर्च काली, पीपल, सोठ, जावची, सालम मिश्री, चोबचीनी पिस्ता, चिरोंजी; प्रत्येक सोलह-सोलह माशा । कुलीजन, अजमोद भुत्ता, पौदीना, मस्तगी, उशथ, मूंग की भस्म आठ-आठ माशा । कस्तूरी दो माशा, मोती एक माशा, वर्क चाँदी बीस नग, वर्क सोना बीस नग, गोद धी में भून लेना चाहिए । अन्तमें चार माशा अम्रक भस्म मिलाकर ढाई तोले का लडू बनाना चाहिए । अत्यन्त पुष्टिकारक, वीर्य वर्धक, और ताकत देनेवाला है । पेशाब की ज्यादती को रोकता है ।
३ चोबचीनी पाक—चोबचीनी पाँच तोला, असगन्ध नागौरी बारह माशा, मूसली सफेद, लौंग, जावत्री, कहरवा, वंशलोचन, प्रत्येक बारह-बारह तोला । विडिया कन्द, सतावर, कोंच के बीज की मींग, जायफल, अकरकरा, कुलीजन, केसर, अजवान, हालों, मेथी, मस्तगी, ढाक का गोद, सत गिलोय, सफेद इलायची दारचीनी पत्रज, बड़ी इलायची के दाने, कमल गट्टे की मींग, तोदरी सफेद, जीरा गुलाब का, जीरा काला, मूंग की भस्म, प्रत्येक आठ-आठ माशा । अम्बर, बालछड़, अगर, नदोली, छः-छः माशा, किशमिश सोलह माशा, बादाम गिरी अंडतालीस माशा, वहसन दोनों सोलह माशा, पिस्ता अंडतालीस माशा, कस्तूरी तीन माशा, उशापा ग्यारह
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काम के शास्त्रीय नुसखे
माशा, मोती छः माशा, चाँदी के बर्क नौ माशा, बर्क सोने के साढ़े तीन माशा, अम्बर दो माशा, संगेयशव चार माशा, गोखरु वड़े छः माशा, ताल-मखाना छः माशा । सबको कपड़छान चूर्ण करके शहद में मिलाकर चालीस दिन, दो तोला रोज खाय, खटाई गुड़ का परहेज रखले तो चालीस दिन में विगड़ा हुआ खून शुद्ध होजाय ।
४ मुहाग सोठ—कसेरू, सिंधाड़ा, कमलगट्टा, मोथा, जीरा, काला जीरा, जायफल, जावत्री, लौंग, नागकंसर, तेजपात, दार-चीनी, कचूर, धाव के फूल, इलायची, सोआ, धनिया, गजपीपल, पीपल, मिर्च, सतावर, प्रत्येक चार-चार तोला । साँठ का चूर्ण एक सेर, मिश्री १२० तोला । घी एक सेर, दूध गाय का आठ सेर । पहले दूध में साँठ डालकर मावा पकावे, फिर इसे घी में भूने, इसके बाद चाशनी कर सब दवाइयों का चूर्ण उसमें मिलादे ।
५ सुपारी पाक—बीस तोला चिकनी सुपारी, कूटकर कपड़छान करे; फिर उन्हें दाई सेर गाय के दूध में पकाकर मावा पकावे । जब मावा जम-जाय तो आध सेर ताजा घी डालकर उसे भून ले । इसके बाद नोचे लिखी दवा कूटछान कर मिलादे । चिराँजी, गोला, दो-दो तोला, जायफल, जावत्री, लौंग, नागकंसर, तेजपात, इलायची छोटी, वंशलोचन चार-चार माशा मिलाकर पाक सिद्ध करे । मात्रा दो तोला । खियाँ के प्रदर रोग की बहुत उम्दा दवा है ।
सुगम चिकित्सा
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तेल
१ विपगर्भ तेल—भिलावा, मालकाँगनी, धतूरे का पंचांग, और मीठा तेलिया, सब एक-एक तोला। तेल तिल का आध सेर, मिलाकर पकाओ। जब भिलावे जलकर तैरने लगे और उनमें सौंक छिद जाय, तब उसे उतारकर छानकर काम में लो। यह सब प्रकार की वायु की बीमारी दर्द आदि के लिए उत्तम है।
२ नारायण तेल—असगन्ध, गंगेरन की छाल, बेलगिरी, पाठा, कटेहली, बड़ी कटेहली, गोखरू, अतिवला, नीम की छाल, देह, पुनर्नवा, पसरन, अरन्ती; प्रत्येक आध-आध सेर। इन्हें जोपुट कर के सोलह सेर पानीमें पकाकर चार सेर रखे। फिर काढ़े को छान कर काढ़े में एक सेर तिल का तेल, चार सेर सतावर का रस और चार सेर गाय का दूध उसमें मिलादे। तथा नीचे लिखी दवाइयों की लुगदी पीसकर मिलादे। कूठ, इलायची बड़ी, सफेद चन्दन, मूर्ण, वच, जटामांसी, संधा नमक, असगन्ध, गभेरन, रास्ता, सोंफ, देवदारु, शालपर्णी, पृष्ठपर्णी, मावपर्णी, मुग्दपर्णी, और तगर। ये सब मिलाकर बीस तोला लिए जायें। फिर सबको पकाकर तेल रहने पर छान लिया जाय। यह प्रसिद्ध नारायण तेल है। इसे सूँघने, खाने, मालिश करने आदि के काम में लिया जा सकता है। इससे लकवा, वातन्याधि, अधर्गण वायु, कमर का दर्द, कम्प वात, पंगुता आदि सभी रोग दूर होते हैं।
३ मीरवादि तेल—काली मिरच, हरताल, निसोत, लालचन्दन नागरमोथा, मन्सिल, जटामांसी, हल्दी, दारुहल्दी, देवदारु,
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