सुगम चिकित्सा
Sugam Chikitsa
आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा
स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)
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५ अष्टादशाङ्गकाढ़ा—दशमूल, चिरायता, कुटकी, नागरमोथा, धनिया, इन्द्र जौं, सांठ, देवदारु, और गजपीपल, इन अठारह दवाइयों का काढ़ा सब प्रकार के सन्निपात ज्वरों तथा निमोनिया में अत्यन्त लाभदायक है।
६ देवदावादि काढ़ा—देवदारु, वच, कूठ, पीपल, सांठ, कायफल, नागरमोथा, चिरायता, कुटकी, धनिया, बड़ी हरड, गजपीपल, धमासा, गोखरू, कटेहली, अतीस, गिलोय, काकड़ासौंगी, काला जीरा, लाल धमासा, इन बीस दवाइयों का काढ़ा पीने से प्रसूति, रोग, शूल, खाँसी, ज्वर, मूछा, खास, कफ वायु, और मस्तक पीड़ा दूर होती है।
७ धान्य पंचक—धानिया, नेत्रवला, चेलगिरी, नागरमोथा, और सांठ, इनका काढ़ा पेट की आँच को निकालता है। तथा दीपन पाचन करता है।
८ धातक्यादि काढ़ा—धाय के फूल, चेलगिरी, लोध, नेत्रवला और गजपीपल का काढ़ा शीतल करके तथा शहद मिलाकर पिलाने से बच्चों को हरे-पीले दस्तों में बहुत फायदा होता है।
९ पुनर्नवादि काढ़ा—साँठ की जड़, हरड, नीम की छाल, दारु हल्दी, कुटकी, पटोल पत्र, गिलोय, और सांठ, इन का काढ़ा गोमूत्र में मिलाकर पीने से पाण्डुरोग, खाँसी, पेट की बीमारियाँ, खास और शूल तथा सर्वाङ्ग की सूजन दूर होती है।
१० कटेहली का काढ़ा—कटेहली के काढ़े में पीपल का चूर्ण पीने से खाँसी तुरन्त दूर होती है।