भारतकोश
सुगम चिकित्सा

सुगम चिकित्सा

Sugam Chikitsa

आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा

स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)

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छोटे बच्चों की परवरिश के सम्बन्ध में

दूध छुड़ाने का सुगम उपाय यह है कि माता बालक से कुछ दिन के लिए अलग हो जावे, वा रात को अपने पास न सुलावे । दूसरी स्त्री के पास सुला दे ।

और यदि मातामें शक्ति होतो जबतक गर्भ न रहे, बच्चेको दूध पिलाये जाय । इससे अधिक पौष्टिक और गुणदायक वस्तु संसार में बच्चे के लिए नहीं है । कहावत भी तो है—“देखें तैने अपनी माता का कितना दूध पिया है !”

दूध पिलाकर बालक का मुँह धो डालना चाहिए, जिससे मक्खी आदि काट न खाय । या मुख के रोग न उत्पन्न हों ।

जब ये चिन्ह माता के शरीर में दीखें तो दूध तुरन्त बन्द कर देना चाहिए ।

(१) जब माता के स्तनों में दूध न रहे ।

(२) जब माता के कानों में सनसनाहट मालूम हो ।

(३) आँखों में आँधेरा-सा जान पड़े ।

(४) आँखों में पीड़ा हो ।

(५) मस्तिष्क में धमक और चित्त व्याकुल हो ।

(६) मूर्छा और थकावट जान पड़े, देह कपड़े, भूख न लगे, अजीर्ण हों, पेट में दर्द हो, ज्वर हो, पेट में सनसनाहट हो, मानों पेट बैठा जाता है, चलते-फिरते देह में दर्द हो, सुखपर पीलापन छा रहा हो, टकने सूक्ष्म आये हों ।

छः महीने तक बच्चे की गर्दन नहीं ठहरती । इसलिए गर्दन के पीछे हाथ लगाये रहना चाहिए । असावधानी करने से बालक की गर्दन