भारतकोश
सुगम चिकित्सा

सुगम चिकित्सा

Sugam Chikitsa

आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा

स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)

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सुगम चिकित्सा

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में भटका चला जाता है और बालक मर जाता है। बालक को इन दिनों न सीधा बैठावे, न सीधा गोदी में ले; क्योंकि ऐसा करने से पीठ में कुन्च निकल आता है; क्योंकि उसकी रीढ़ की हड्डी बहुत नरम होती है। एक वर्ष से पूर्व बालक को अपने पेरों कभी न खड़ा न करे, इससे पाँव चिथड़ा जाते हैं। जब बालक स्वयं खड़ा होसके तभी खड़ा करे, वा होने दे। उसे अपनी नींद सोने और उठने दे।

परन्तु दूध पी कर ही तुरन्त बालक को न सोने दे, इससे उसका भोजन पचता नहीं है और स्वप्न भी घुरे दीखते हैं। तीन वर्ष की आयु तक तो बालक को दिन में सोने दे; पीछे केवल रात्रि के ही सोने की आदत डाले, दिन में नहीं।

बहुधा स्त्रियाँ काम करने के लालच से बच्चे को अफीम आदि देकर सुलाती हैं। सभी जानते हैं अफीम विष है, सो नन्हें-से बच्चे को विष देना डायन माता ही का काम है, जो बहुत घुरा है। ऐसे नशों से बालकों के मस्तिष्क वचपन से ही निर्बल और खुरक होजाते हैं।

सोती बार माता बालक को अपनी देह से चिपटाकर न सुलावे और यदि ऐसा ही हो तो उसे सदा कर्वट लेकर अर्थात् उसकी पीठ माता की ओर रख कर सुलावे।

विछौना नरम और सूखा रहना चाहिए। कोई वस्तु चुमती न हो। पोतड़े भीगने पर तुरन्त बदल देना चाहिए।

बच्चों को धूल-भिट्टी में न होने देना चाहिए। रात्रि को नीम वा सरसों के तेल का काजल आँखों में लगा दिया करे और प्रभात को