भारतकोश
सुगम चिकित्सा

सुगम चिकित्सा

Sugam Chikitsa

आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा

स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)

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छोटे बच्चों की परवरिश के सम्बन्ध में

काजल मुख धोकर फिर लगा देना चाहिए ।

बहुतेरी माताएँ भूत-प्रेत, डाकनी-मसान के भूषणों से बच्चे को बचाने के लिए वीसियों कठले, गन्ड़े-तावीज से बच्चों का शरीर भर देती हैं; पर इन सबमें मैल भर जाने से छोटे-छोटे कीड़े अरुड़े—दे देते हैं और रोग का जमघट जम जाता है । रोग से बचना तो एक और रहा—ऐसे ही बच्चे सदा रोगी रहते हैं ।

मुख से लार टपककर भी कपड़े अधिक मैले रहते हैं, इससे उचित तो यह है कि एक रूमाल उसके गले में बँधा रहे । उसे रोज धोना और साफ करना चाहिए । यदि अधिक लार बहे तो यह दवा बनाकर रख ले और एक माशा नित्य कई बार चटावे ।

एक पाव मिश्री को एक छटाक गुलाब-जलमें चाशनी करो । जब चाशनी एक तार की आजाय तो उसमें २।। तोला रूमीमस्तगी असली बारीक पीसकर अच्छी तरह मिलादे और किसी इमर्तान में भरकर रखले ।

बच्चों की आँत लटककर अण्डकोप में लटक जाती हैं । इस लिए उचित तो यह है कि कटिबन्धन ( कौंधनी ) पहनाये रखे—जिससे वह नस दबी रहती है । यदि थसक गई हो तो बालक को जाँघिया पहनाये रखे, इससे ठीक रहती है ।

बालक को रोज अमरण कराना चाहिए । जाड़ों में दोपहर और धूप के समय । गर्मी में साँझ-सवेरे; वर्षा में जब बादल न हों वा बूँद न पड़ती हों । हर दशा में बालक को गर्मी-सर्दी दोनों से बचाये रखे ।