सुगम चिकित्सा
Sugam Chikitsa
आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा
स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)
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जब बालक तीन वर्ष का होजाय तो उसे नित्य प्रातःकाल नहलाने की वान डालनी चाहिए। यदि वह दुर्बल हो तो उसके नहाने के पानी में संधा नमक डाल दे। इससे थोड़े ही दिन में निर्बल बालक सबल और पुष्ट होजाता है। पानी में मेथी या मेहदी डाल कर गरम करले, उससे स्नान भी गुणकारी होता है।
उनके कान और बालों में चौथे वा पाँचवे दिन कड़वा तेल डालना चाहिए और जिन दिनों में दाँत निकलते हों उन दिनों अवश्य डाले। इससे आँख नहीं दुखती और कनपटी जो इस दशा में भड़का करती है, नहीं भड़कती और चैन पड़ता है।
बालकों के सिर पर मैल जम जाता है उसको भी धोकर निकाल देना चाहिए। पीछे तेल डालदे, इससे मस्तक में तरी रहती है, नींद अच्छी आती है, खुशकी नहीं बढ़ती। ऐसा न करने से प्यास बढ़ जाती है जिससे न तो बाल बढ़ते हैं और न हृद होते हैं, न मस्तक चलवान रहता है जिससे बालक बहुधा मूर्ख और निर्बुद्धि रह जाते हैं।
सँभाले न रखने से बहुधा बच्चों को मिट्टी खाने की आदत पड़ जाती है। जिससे पेट बढ़ जाता है। मूत्र सफेद आने लगता है और अजीण हो जाता है तथा सारे शरीर का रंग सफेद पड़ जाता है। दूसरे-तीसरे दिन बच्चे को थोड़ा गुड़ खिला देना चाहिए।
उन्हें कभी नहीं डराना चाहिए। डरने से बच्चे कभी-कभी ऐसे डर जाते हैं कि वे सदा के लिए डरपोक बन जाते हैं। वह भय कभी उनके हृदय से नहीं निकलता। स्वप्न में वही बात देखकर वे डर उठते