भारतकोश
सुगम चिकित्सा

सुगम चिकित्सा

Sugam Chikitsa

आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा

स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)

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सुगम चिकित्सा

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शरीर—सात धातु, आशय, भ्रमनी, सिरापेशी, कर्मेन्द्रिय, ज्ञानेन्द्रिय सब मिलकर शरीर कहाता है।

पुरुष—शरीर, मन और आत्मा के समवाय सम्बन्ध को पुरुष कहते हैं।

वात, पित्त, कफ, तीन दोष हैं। देह को दूषित करने के कारण इन्हें दोष कहते हैं। वात, खुरक, हल्दी, चंचल और नेता है,

पित्त गर्म, द्रव और तेज है, कफ ठण्डा चिकना और भारी है। तीनों दोष सारे शरीर में रहते हैं।

वात ५ प्रकार का है—१— उदान वायु कण्ठ में रहता है। बोलना, हँसना इसीसे होता है, इसमें खराबी होने पर हँसकी से ऊपर के रोग होते हैं। २— प्राणवायु हृदय में रहता है, यह मूह में जाता है, अन्न को यही ले जाता है, इसमें खराबी आने से हिचकी और दम की बीमारी होती है। ३— समानवायु भेद में रहता है, यह खुराक को पचाकर मल-मूत्र को अलग करता है। इसमें खराबी आने से मन्दाग्नि और अतिसार वायगोला आदि बीमारी होती हैं। ४— छ्पान वायु आँतों में रहता है; यही दस्त, पेशाब, वीर्य और गर्भ को बाहर निकालता है। ५— व्यानवायु तमाम शरीर में रहता है। इसीसे खून शरीर में दौरा करता है और यही पसीना निकालता है। इसी प्रकार पित्त भी पाँच प्रकार का होता है। पाचक पित्त भेद में रहकर खाना हजम करता है। रंजक जिगर में रहकर खून को शुद्ध करता है। साधक हृदय में रहकर बुद्धि और स्मृति को ठीक रखता है। आलेखक आँखों में रहकर रूप दिखाता है। आजक