सुगम चिकित्सा
Sugam Chikitsa
आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा
स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसुगम चिकित्सा
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रक्त जीवन का साधन है। शरीर को जीवित और चैतन्य रखता है। हृदय में इसका भण्डार है। शरीर में घूमने से वह
गन्दा होकर नीले रङ्ग का होजाता है। वह रक्त नालियों में होकर हृदय में आता है। वहाँ से
फेफड़ों में जाता है। वहाँ साँस के साथ गई हवा गन्द्गी चूस लेती है, जिससे खून साफ होजाता है और फिर लाल होकर शरीर में लौट जाता है।
छाती में बाईं ओर सातवीं पसली के नीचे हृदय है। यह माँस का बना होता है। इसमें चार कोठरी हैं। सूत में बन्द कमल के फूल के
समान उल्टा धरा है। थड्कन के साथ खुलता और हृदय बन्द होता है। इसकी लम्बाई ४ इञ्च, चौड़ाई ३। इञ्च,
मोटाई २। इञ्च है। जवान आदमी का हृदय चार से छः छटाँक तक वजनी होता है, बूढ़ी में वजन कम होजाता है। १०—१५ तोला खून हर वक्त हृदय में बना रहता है। जितनी बार हृदय थड्कता है उतनी ही बार नाड़ी चलती है।
फेफड़े साँस लेने के काम में आते हैं। ये स्पंज की तरह छेद वाले हैं। छाती के दोनों ओर दो होते हैं। इनके बीच में हृदय
फेफड़े है। इनकी शकल सूँड के आकार की है।
वजन अन्दाज़न १। सेर होता है। दाहिना कम लम्बा पर, वजनी होता है। स्त्रियों का फेफड़ा पुरुषों से हल्का होता है।