भारतकोश
सुगम चिकित्सा

सुगम चिकित्सा

Sugam Chikitsa

आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा

स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

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सुगम चिकित्सा

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भारी । सन्निपात में टेढ़ी फटी हुई, भीतर धँसी हुई, या अथखुली । वायु से फटी और रुखी, पिस्त से लाल या आँखव जीभ काली, क्रक से सफेद, कफ से लिपी हुई-सी । सन्निपात में जली हुई-सी । जीभपेट की खराबी और कृच्छ्र में मैली और नीरस । साँस में बदबू । आँतों में आँव रक्त से जीभ, होठ और मुँह में झाले । जिगर की बीमारी में जीभ में घाव रहते हैं । रोगी के मुँह का स्वाद वायु से नमकीन, पिस्त से कड़ू आ, क्रक से मीठा, सन्निपात में जड़ होता है ।

जिसकी भाँहे नीचे को मुक्त जाँच या ऊपर चढ़ जाँच उसकी मृत्यु निकट है । जिसका स्वभाव एकाएक बदल जाय, आँखें घूमे, मस्तक और गर्दन गिर जाय, बोली बदल जाय, मृत्यु लक्षण सिर से सूखे गोबर की तरह चूरा गिरे, सुबह के बक्त ललाट में पसीना आवे, नाक का छेद लाल हो जाय, या फुन्सी दिखाई दे, शरीर या मुँह का आधा रंग बदल जाय, बीमार के दोनों होठ पके जामन की तरह काला हो जाय, या दाँत काले हो जाँच, जीभ फूल जाय या काली हो जाय, आँखें फटी की फटी रह जाँच, सिर के बाल और भौं एकाएक कँधी से घाने की तरह मालूम हों, तेल न लगाने पर भी चिकनाई मालूम हो, पलकों के बाल भड़ जाँच, नाक टेढ़ी हो जाय, नाक का छेद बड़ा हो जाय, हाथ पैर और साँस ठण्डी हो जाय, जो मुँह फैलाकर साँस ले, या दूटी साँस ले, जो बात कहते-कहते बेहोश हो जाय और चित्त सोकर दोनों पैर इधर-उधर पटकें, तो उसकी मौत पास ही जानना ।

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